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जानिए कहाँ श्मशान घाट में ENTRY के लिए लेनी पड़ती है TICKET, आखिर क्या देखने आते हैं लोग ?

बीकानेर / आपने हमेशा शमशान घाट को साधारण रूप में देखा होगा. किसी की मौत पर लोग जाते हैं, लेकिन इस खबर में हम आपको ऐसे शमशान घाट के बारे में बता रहे है जिसे देखने के लिए बाकायदा आपको टिकट लेना पड़ेगा. इसमें बनी कलात्मक छतरियां देशी ही नहीं विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है. शमशान घाट में एक ऐसी भी छतरी है, जिसमें कभी दूध निकलता था.

बीकानेर के देवीकुंड सागर के शमशान घाट को देखने रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं. देवी कुंड सागर वो स्थान है जो बीकानेर राजघराने की अंतिम विश्राम के रूप में जाना जाता है. राज परिवार के सदस्यों का इसी स्थान पर अंतिम संस्कार या यूं कहें कि अंत्योष्टि की जाती है. बीकानेर रियासत के प्रथम तीन चार महाराजाओं को छोड़ सभी राजाओं की अंत्योष्टि इसी स्थान पर की गई, जिसके कारण इस स्थान का राजपरिवार के साथ-साथ उनसे जुड़े लोगों और आम जनता के लिए आस्था का विशेष केन्द्र के रूप में जाना जाता है.

देवी कुण्ड सागर में अंत्योष्टि के स्थान पर महाराजा और उसके परिवार की याद में छतरियों का निर्माण करवाया गया. जो आस्था के साथ-साथ पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है. इस छतरियों का निर्माण दो तरह के पत्थरों से किया गया है. महाराजा रायसिंह के पहले की छतरियां लाल पत्थर से बनी हुई है. वहीं, उसके बाद वाली छतरियां संगमरमर के पत्थर से बनी हैं. इन छतरियों में राजपूत और मुगल की स्थापत्य कला का नमूना पेश किया गया है. पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियां आने वाले पर्यटकों को गौर से देखने को विवश कर देती है.

देवी कुण्ड सागर में एक ऐसी छतरी है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें से दूध निकलता था. दूध छतरी के खंभों के सहारे बने दो छोटे-छोटे कुंड में जाता था. ये छतरी बीकानेर रियासत के सबसे लोकप्रिय महाराजा गंगासिंह जी की पत्नी बलभ कुंवर जी की है. कहा जाता है कि इस छतरी से दूध या उसी तरह का पदार्थ निकलता था, जिसके बहने के अवशेष आज भी दिखाई दे रहे हैं. स्थानीय लोगों के लिए जहां ये आस्था का विषय है तो वहीं विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र भी बना हुआ है.

इतिहासकार डॉ. शिव भनोत इन छतरियों के बारे में कहते हैं कि देवी कुंड सागर में बीकानेर रियासत के तीसरे राजा के बाद बाद कि बनी ये छतरिया स्थापत्य कला का खास नमूना है. वहीं, दूध वाली छतरी के बारे में कहते हैं कि इसके बारे इतिहासक रूप में कोई प्रमाण नहीं है. उनके अनुसार सीमेंट के प्रयोग से पहले बीकानेर में निर्माण चुना पत्थरों को पीस कर किया जाता था. हो सकता है सीलन के कारण इसके जॉइंट में ऐसा पदार्थ निकलता जो दूध की तरह लगता हो. हालांकि, वो कहते हैं कि ये आस्था का विषय है इसलिए नकारा भी नहीं जा सकता.

बहरहाल, इस छतरी को लेकर रहस्य कुछ भी हो इतिहासकार चाहे इसे प्रमाणिता नहीं होने की बात करते हो, लेकिन ये भी सोचने वाली बात जिस चुने पत्थर का तर्क जो दिया जाता है तो बाकी छतरियों से इस तरह की घटना क्यों नहीं होती. आखिर दूध वाली छतरी का रहस्य क्या इसके बारे में अलग धारणा बनी हुई है. zeenews.com

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