VIDEO – 450 साल पुराने इतिहास से जुड़ा है नाता सती के धाम का, शिलाओं और उन पर उकेरी गई कलाकृतियां गोंड राजाओं छोड़ती है छाप …

कोरिया जिले के चिरमिरी बरतूंगा कालरी के पास लगभग साढ़े चार सौ साल पुराने सती मंदिर के अवशेष मौजूद है। पत्थरो में उकेरी गई कलाकृतियां इसे गोंड शासनकाल से जोड़ती है। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण ज्यादातर मुर्तिया व पत्थर खंड – खंड हो चुकी है। ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व होने के बावजूद प्रशासन एवं पुरातत्व विभाग का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। यह तो स्थानीय लोगो की आस्था है जिसके कारण कुछ वर्षो पहले ही यहाँ बाउंड्री वाल का निर्माण कराया गया है। जिसके कारण कुछ हद तक ये ऐतिहासिक और पुरातात्विक मंदिर के खंडित पत्थर सुरक्षित रखें हुए है।

वैसे तो छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में कई ऐसे स्थल है जहाँ पुरातन काल के अवशेष मिलते हैं परंतु काले हिरे की नगरी में स्थित सती का धाम इनमे अपना एक अलग मुकाम रखता है. हालाँकि इसका कोई लिखित इतिहास नहीं है लेकिन किवदंतियां और इससे जुडी लोगों की मान्यताएं इस दैवीय स्थल को एक अलग ही विशिष्ट स्थान और रूप प्रदान कर देती हैं।

दरअसल कोयला क्षेत्र चिरमिरी के बरतूंगा इलाके में सैकड़ों साल पुरानी बिखरी हुई शिलाओं का एक खंड है और इन्ही के बीच देवी सती की मूर्ति भी विराजमान है. जानकारों की माने तो यह शिलाएं और दैवीय स्थल तक़रीबन 450 साल से भी ज्यादा पुरानी है. माना जाता है की इस स्थल के तार गोंड काल से जुड़ते है और इसके कुछ प्रमाण भी इन शिलाओं में उकेरी गई कलाकृतियों से स्पष्ट होते है. खैर सबसे पहले बात कर लेते हैं सती के इस धाम और माता सती की आलौकिक शक्तियों की. लोगों की मान्यता माता सती को लेकर हद दर्जे की है. मान्यता के अनुसार जिसने यहाँ जो माँगा उसकी मुराद माता सती पूरी करती है मतलब कोई भी देवी सती के इस दरबार से खाली हाँथ नहीं जाता. पुराने जानकारों की माने तो इस दैवीय स्थल के पास से हो कर गुजरने वाले हर व्यक्ति को माता के दरबार में सर झुकाकर हाजरी लगानी पड़ती है. इस स्थल के इतिहास के बारे में कोई भी ठीक-ठीक बता पाने वाला तो कोई नहीं है लेकिन इस मंदिर के आदि काल से पुजारी रहे परिवार के सदस्य हरभजन सिंह बताते हैं की देवी सती उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं और कई पीढ़ियों से उनके पूर्वज देवी की सेवा करते आ रहे है. कुछ अन्य जानकारों की माने तो उनके मुताबिक इस स्थल पर किसी ज़माने में कोई महिला सती हुई थी जिसके बाद इस स्थल का नाम सती मंदिर रख दिया गया।

इस स्थल और इसकी आलौकिक शक्तियों की गाथा तो है ही रोचक ………….लेकिन इस पुरातन माने जाने वाले वाले स्थल पर मौजूद  प्रतीत होती है. इन शिलाओं के बिच में हाँथ की कलाकृति उकेरी गई है वही हाँथ के एक और चंद्र और दूसरी और सूर्य की कलाकृति है. इसी तरह कई शिलाओं में घोड़े पर सवार एक स्त्री है जिसके एक हाँथ में तलवार और दूसरे में ढाल है जो गोंडवाना की रानी वीरांगना दुर्गावती की छाप छोड़े हैं. इसी तरह इस स्थल पर किसी प्राचीन गाढ़ी के अवशेष भी मौजूद हैं. जिसमे कई मजबूत खम्भों सहित खंडित चक्र नुमा गाढ़ी की अंदर का भाग भी है . वहीँ स्थल पर शिव लिंग की पिंडी भी दर्जनों की संख्या में है. इतना ही नहीं कहा तो यहाँ तक जाता है की इस स्थल से सूरजपुर जिले में स्थित कुदरगढ़ दैवीय स्थल तक के लिए किसी ज़माने में सुरंग भी हुआ करती थी जो कालांतर में क्षतिग्रस्त हो कर बंद हो गई है। बताया जाता है की इलाके में कोल उत्पादन शुरू होने से पहले यह इलाका बीहड़ जंगलो से घिरा हुवा था और इस धाम तक पहुँच पाना बेहद खतरनाक होता था. लेकिन जैसे-जैसे इलाके में कोल कंपनियों की पैठ बढ़ी वैसे-वैसे क्षेत्र में बसाहट की धमक हुई, लोग इस धाम तक आसानी से पहुँचने लगे.जहाँ एक और बसाहट बढ़ने की वजह से इस धाम तक लोग पहुंचे वैसे-वैसे इसकी मान्यता जान कर लोगो की माता के प्रति आस्था भी बढ़ी. लेकिन एस.ई.सी.एल. की बढ़ती खदानों ने इस प्राकृतिक स्थल की प्रकृति को कई चोट पहुंचाए.वहीँ उदासीन प्रशासनिक रवैये की वजह से इस स्थल की दुर्दशा में कोई कोर कसर नहीं बची. हालाँकि कुछ साल पहले इस स्थल को बाउंड्री वाल से घेर दिया गया है परंतु यह तब हुआ जब लगभग पूरी तरह से इस प्राचीन स्थल ने अपनी पौराणिकता गवां दी।

शासन प्रशासन की अनदेखी ही है की यह स्थल अपने आप में लोगों की आस्था के साथ-साथ पुरातात्विक दृष्टिकोण से अपने आप में महत्वपूर्ण होने के बावजूद भी उपेक्षाओं का शिकार हो गया। सती मंदिर में बिखरे पुरातन काल के अवशेष के वो महत्वपूर्ण अंश पत्थरो में साफ़ दिखाई पड़ते है पर अब इसे बचाने की पहल प्रशासन को करनी चाहिए, चुकी समय रहते अगर ऐसा न हुआ तो शेष दिखाई पड़ रहे सैकड़ो वर्ष पुर्व से पड़े यह पत्थर धीरे – धीरे गायब हो जायेंगे।

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