VIDEO – आदि शक्ति माँ ज्वाला देवी मंदिर धूमा देवी के नाम से भी प्रसिद्द है, प्रतिदिन 5 बार होती है भव्य आरती ….

आदि शक्ति माँ ज्वाला देवी के मंदिर की कई किवदंतियां प्रचलित हैं, यहाँ भक्तों के श्रद्धा भाव से सिर्फ एक नारियल मात्र चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है, माँ ज्वाला देवी का यह शक्तिपीठ धूमा देवी के नाम से भी प्रसिद्द है, माँ ज्वाला देवी के मंदिर में शांति और सोंदर्य का अद्भूत अनुभव भक्तों को यहाँ बार -बार खींच लाता है। 
माँ ज्वाला देवी का मंदिर माँ के सभी 51 शक्तिपीठों में से सबसे अधिक उंचाई पर स्थित है शांति और सोंदर्य का अद्भूत अनुभव भक्तों को यहाँ बार -बार खींच लाता है यहाँ भक्तों के श्रद्धा भाव से सिर्फ एक नारियल मात्र चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है यहाँ मन में आये अहंकार दूर होते है और मन को शांति मिलती है माँ के इस चमत्कारिक स्थान पर हवन करने से जो पुण्य मिलता है वह 10000 यज्ञों के पुण्य के समान माना गया है माँ ज्वाला देवी का यह शक्तिपीठ धूमा देवी के नाम से भी प्रसिद्द है
इस शक्तिपीठ में माँ को पंचोपचार, दशोपचार व षोडशोपचार द्वारा पूजा सबसे अधिक प्रिय है | माँ के इस स्थान पर प्रतिदिन पाँच बार भव्य आरती होती है जिसमें प्रथम आरती ब्रह्म मुहूर्त के समय जिसे श्रंगार आरती कहते है | इसके कुछ समय बाद दूसरी आरती जिसे मंगल आरती के नाम से जाना जाता है | तीसरी आरती दोपहर को , चौथी आरती संध्या के समय और अंतिम आरती का समय रात्रि 9 बजे होता है जिसे शैय्या आरती कहते है | यहाँ दिन में एक समय माँ की तंत्रोक विधि द्वारा शत्रुओं के नाश के लिए व नवग्रह शांति के लिए गुप्त खपर पूजा भी की जाती है |

वैसे तो पूरे वर्ष माँ ज्वाला देवी के मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी रहती है | लेकिन नवरात्रों के समय और श्रावण मास में लाखों की संख्या में भक्त यहाँ माँ के दर्शन करने आते है | ऐसी मान्यता है कि इस समय माँ से लगाई गई अरदास अवश्य पूरी होती है |
माता के इस चमत्कारिक मंदिर में पृथ्वी के गर्भ से निकल रही 9 ज्वालाओं की पूजा होती है | चमत्कारिक रूप से प्रज्वल्लित हो रही ये 9 ज्योति माँ के 9 अवतारों के रूप में प्रसिद्द है जिसमें सबसे बड़ी व प्रमुख ज्योति को महाकाली के रूप में पूजा जाता है और इसके साथ -साथ माँ अपने अन्य रूपों – माँ अन्नपूर्णा , चण्डी , हिंगलाज , विंध्यावासिनी , महालक्ष्मी , सरस्वती , अम्बिका व अंजी देवी के रूप में अन्य 8 ज्योतियों में विराजमान है | अनादि काल से प्रजव्ल्लित हो रही इन ज्वालाओं के ऊपर ही बाद में मंदिर का निर्माण कर दिया गया | इस मंदिर का प्राथमिक निर्माण राजा भूमि चंद द्वारा किया गया जिसका पूर्ण रूप से निर्माण 1835 में राजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद के शासन काल में हुआ |
एक पौराणिक कथा के अनुसार गुरु गोरखनाथ माता के प्रिय भक्त हुआ करते थे | एक समय की बात है जब गोरखनाथ ने भूख से व्याकुल हो माता से आग्रह किया कि आप अग्नि जलाकर पानी गरम करें मैं अभी भिक्षा लेकर आता हूं | ऐसा कहकर गुरू गोरखनाथ जी भिक्षा के लिए  चले जाते है और माता उनके आग्रह पर अग्नि प्रजव्लित कर पानी गरम कर देती है | किन्तु गोरखनाथ आज तक वापिस नहीं लौटे और माता अपने भक्त के इन्तजार में आज भी इस स्थान पर अग्नि प्रज्वल्लित किये हुए है | ऐसी मान्यता है कि कलयुग के बाद जब पुनः फिर सतयुग आएगा तब गोरखनाथ भिक्षा लेकर आयेंगे और तब तक यह ज्वाला इसी प्रकार से प्रज्वलित होती रहेगी |
हालाँकि आधुनिक शोधकर्ता भी ज्वाला प्रजव्लित होने के ठोस कारणों का अभी तक पता नहीं लगा पाए है |
माँ ज्वाला देवी के मंदिर में  बिना किसी तेल, घी, दिया बात्ती के ज्वाला प्रजव्लित होने के साथ – साथ एक और चमत्कार देखने को मिलता है | मंदिर के परिसर में ही स्थित पानी का एक छोटा सा कुंड जो गोरख डिब्बी व गोरख मंदिर के नाम से प्रसिद्द है | इस जल कुंड को देखने से पानी खौलता हुआ(उबलता हुआ) प्रतीत होता है किन्तु जैसे ही पानी में हाथ डालकर देखा जाये तो पानी ठंडा महसूस होता है |
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