कुपोषण मुक्ति की आड़ में अपनों का ‘पोषण’ 19 साल बाद भी कुपोषण मुक्त नहीं हो पाया छत्तीसगढ़

मनोज चंदेल की विशेष रिपोर्ट…..
00 प्रदेश में चार लाख, 92 हजार बच्चे कुपोषण के शिकार

राजनांदगांव / जब छत्तीसगढ़ की सियासत अंड़े पर उबाल मार रहा हो तो ऐसे समय में अंडे को कुपोषण मुक्ति का एक बेहतर रास्ता बताने वालों के लिए यह चिंतन भी जरूरी हो जाता है कि क्या वाकई अंडा खाने से बच्चों का कुपोषण दूर हो जाता है…. या कुपोषण दूर हो जाएगा?

इस सवाल के जवाब में लोगों के मत मतांतर तो स्वभाविक है पर यदि अंडा खाने से बच्चों का कुपोषण दूर हो जाता है तो फिर छतीसगढ़ में कुपोषित बच्चों की संख्या चार लाख, 92 हजार 176 कैसे पहुंच गई? छत्तीसगढ के लिए इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है जब 19 साल के उम्र में भी उसे कुषोषण से छुटकारा नहीं मिला है। प्रतिवर्ष अरबों रूपए कुपोषण मुक्ति के नाम पर खर्च किए जाने के बाद भी राज्य में लगातार बढ़ रहे कुपोषित बच्चों का आंकडा यह प्रमाणित करता है कि योजना की राशि का जमीनी पर स्तर पूरी ईमानदारी के साथ क्रियान्वयन नहीं हो रहा है?

कुल मिलाकर यह कहा जाए कि सरकारी कारिंदा और योजना का जिम्मेदार महिला बाल विकास विभाग तथा उससे जुड़ा अमला कुपोषण मुक्ति की आड़ में केवल अपना ‘पोषण करने में लगा हुआ है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी? अब सवाल यह उठता है कि पूर्व की भाजपा सरकार ने जब सरकारी स्कूलों और आंगनबाडियों में कुपोषण दूर करने को लेकर बच्चों को हरी सब्जियां और प्रोटीन युक्त भोजन खिलाने का काम किया था तो फिर प्रदेश में कुपोषित बच्चों के ये आंकड़े कहां से आ गए जो वर्तमान कांग्रेस सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अनिला भेडिय़ा ने हाल ही विधानसभा के मानसून सत्र में एक विधायक के जवाब में प्रस्तुत किए हैं?

उल्लेखनीय है कि पूर्व की भाजपा सरकार ने भी स्कूल और आंगनबाडियों में अंडा बंटवाने की तैयारी की थी पर चौतरफा विरोध के बाद इस निर्णय अमल नहीं किया गया था।



▶ कुपोषित बच्चों की संख्या में बिलासपुर अव्वल
▶ राजनांदगांव दूसरे नंबर पर

कांग्रेस की सत्ता आने के बाद छत्तीसगढ में कुपोषित बच्चों के जो आंकड़े सामने हैं उसमें सत्ताईस जिलों में बिलासपुर जिला कुपोषित बच्चों की संख्या के मामले में अव्वल नंबर पर है। दूसरे नंबर पर राजनांदगांव जिला है जहां कुपोषित बच्चों की संख्या 32 हजार 756 है। तीसरे नंबर पर बलौदाबाजार है जहां पर कुपोषित बच्चों की संंख्या 29 हजार 737 है।


विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों को मानें तो प्रदेश का प्रत्येक जिला कुपोषण का शिकार है। जानकारी के अनुसार कुपोषण में कमी लाने को लेकर भाजपा सरकार के कार्यकाल से पूरे छतीसगढ में मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना, नवा जतन योजना, मुख्यमंत्री अमृत योजना, महतारी जतन योजना, आंगनबाड़ी गुणवत्ता अभियान, सुपोषण चौपाल, पूरक पोषण आहार कार्यक्रम चली आ रही है। यही योजना वर्तमान में भी क्रियान्वित है। हाल ही के तीन साल के आंकड़ों पर जाएं तो वित्तीय वर्ष 2016-17 में इन योजनाओं में कुल 18 करोड, पैतीस लाख, 77 हजार रूपए व्यय किए गए है जबकि वित्तीय वर्ष 2017-18 में पंद्रह करोड, 65 लाख, 89 हजार रूपए व्यय किए गए है। इसी प्रकार वित्तीय वर्र्ष 2018-19 में चार अरब, 54 करोड़, पांच लाख, 76 हजार रूपए खर्च किए गए हैं।


अब सबसे अहंम प्रश्र यह खड़ा होता है कि कुपोषण में कमी लाने वाली योजनाओं पर खर्च की जाने वाली राशि आखिर जाती है। यदि सही मायने में राशि का उपयोग होता कुपोषित बच्चों की संख्या बढऩे की बजाय घटती जाती?

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