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महाकाल मंदिर के रहस्य: दक्षिणमुखी शिवलिंग से भस्म आरती तक, ऐसे चमत्कार जो आज तक दुनिया नहीं समझ पाई


उज्जैन। आस्था, चमत्कार और अध्यात्म की धरा उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग अपने भीतर इतने रहस्य समेटे है कि आज तक इतिहासकार और शोधकर्ता भी स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाए। यहाँ माना जाता है कि समय भी महाकाल के आदेश पर चलता है, इसलिए इस शिवलिंग को महाकालेश्वर कहा गया।

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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की सबसे विशेष बात यह है कि यह दुनिया का एकमात्र शिवलिंग है जो दक्षिणमुखी है। सामान्यतः शिवलिंग पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होते हैं, लेकिन महाकाल का स्वरूप दक्षिण दिशा की ओर स्थापित है। माना जाता है कि यह स्वरूप तामसिक और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक है और पूरी पृथ्वी की नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित करता है।
उज्जैन में मान्यता है कि यहाँ के राजा स्वयं महाकाल हैं। कहा जाता है कि कोई भी राजा, सम्राट, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री उज्जैन में रात नहीं रुकता। इतिहास में कई बार यह परंपरा टूटने पर शासन या व्यक्तिगत जीवन में संकट के उदाहरण भी मिले हैं। इस परंपरा के कारण आज तक सत्ता में बैठे बड़े पदाधिकारी उज्जैन में रात्रि प्रवास नहीं करते।


महाकाल मंदिर की भस्म आरती पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यह आरती ब्रह्ममुहूर्त में होती है और भगवान का श्रृंगार भस्म से किया जाता है। प्राचीन समय में यह भस्म शवदाह की चिता से लाई जाती थी, जो मृत्यु के बाद नए जीवन के दर्शन का संदेश देती थी। नियम आज भी जारी है, हालांकि अब पवित्र भस्म का उपयोग होता है।


महाकाल मंदिर के शीर्ष भाग में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर वर्ष में केवल एक बार नाग पंचमी के दिन खुलता है। उस दिन लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुँचते हैं। वर्ष के अन्य सभी दिन मंदिर बंद रहता है और किसी को भी वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं होती।


मुगल काल के आक्रमण के दौरान, कथाओं के अनुसार पुजारियों ने मूल शिवलिंग को सुरक्षित रखने के लिए उसे भूमिगत कर दिया था। बाद में वर्तमान शिवलिंग की स्थापना की गई और पुराने स्वरूप को जूना महाकाल के नाम से पूजा जाना शुरू हुआ। आज भी भक्तों की विशेष आस्था जूना महाकाल के दर्शन के लिए बनी रहती है।


महाकाल मंदिर के पास स्थित कालभैरव मंदिर एक और बड़ा रहस्य समेटे है। इस मंदिर में भगवान को शराब अर्पित की जाती है। भक्तों और पुजारियों द्वारा अर्पित की गई शराब कहाँ गायब हो जाती है, इसका आज तक कोई वैज्ञानिक उत्तर नहीं दे पाया।

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प्राचीन ग्रंथों में उज्जैन को समय की गणना का केंद्र बताया गया है। माना जाता है कि यहीं से विश्व के समय का मानक निर्धारित किया जाता था, इसलिए शिव को महाकाल यानी समय के परम स्वामी की उपाधि मिली। यहाँ यह विश्वास आज भी कायम है कि समय नहीं चलता, समय चलता है महाकाल की इच्छा से।


भारत के ज्यादातर मंदिरों में ग्रहण के दौरान कपाट बंद कर दिए जाते हैं, लेकिन महाकाल मंदिर में ग्रहण के समय भी पूजा और दर्शन नहीं रुकते। मान्यता है कि जब मंदिर का स्वामी ही काल है तो ग्रहण जैसे प्रभाव उस पर असर नहीं डालते।


महाकाल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रहस्यों, चमत्कारों, अध्यात्म और दर्शन का ऐसा संगम है जो श्रद्धालुओं को मृत्यु से परे भी जीवन का अनुभव कराता है। यहाँ पहुँचकर हर भक्त के मन में एक ही विचार उत्थित होता है—
राजा कोई भी हो, महाकाल ही असली राजा हैं।

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