कोरिया / योग मात्र एक शारीरिक व्यायाम ही नही बल्कि सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान है। योग बहुत विराट है और उसमें विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान है। उक्त बातें मुख्य योग शिक्षक संजय गिरि नें जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान ( डाइट ) कोरिया बैकुण्ठपुर में व्याख्याताओं के द्वितीय बैच योग प्रशिक्षण के चौथे दिन के प्रथम सत्र में सोमवार को कही।
श्री गिरि नें सोमवार के प्रथम सत्र में व्याख्याताओं को ” मानव शरीर के विभिन्न संस्थानों पर योग के प्रभाव” पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि मानव शरीर विभिन्न संस्थानों – अस्थि संस्थान, मांसपेशी संस्थान, रक्त प्रवाह संस्थान,श्वसन संस्थान,पाचन संस्थान, स्नायू संस्थान, अंतःस्रावी संस्थान,उत्सर्जन संस्थान व प्रजनन संस्थान से मिलकर बना है। ये विभिन्न संस्थान आपस में जुड़कर सक्रियता में वृद्धि व स्वास्थ्य को बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। योग आसन ऊर्ध्व ताड़ासन, तिर्यक ताड़ासन, भुजंगासन, गोमुखासन, उष्ट्रासन, भ्रस्त्रिका, अनुलोम-विलोम व कपालभांति प्राणायाम के साथ सूक्ष्म व्यायाम एवं योगिक जॉगिंग के अभ्यास से श्वसन क्रिया को सुचारू, श्वसन क्रिया की दर में कमी,हृदय एवं श्वांस संबंधी रोगों सर्दी-खांसी, जुकाम, एलर्जी, साइनस, कफ रोग, थाइरोइड, टॉन्सिल रोग दूर होते है। जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है।
पाचन संस्थान का कार्य हमारे आहार द्वारा ग्रहण किये गए भोजन को तरल पदार्थ में परिवर्तित करके रक्त में अवशोषण कर शरीर को ऊर्जा देना है। इसके अंतर्गत मंडूकासन, योगमुद्रासन, शशकासन, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, नौकासन, मयूरासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, ताड़ासन, तिर्यक ताड़ासन, कटिचक्रासन, तिर्यक भुजंगासन, वज्रासन के साथ कपालभातीं, अनुलोम-विलोम व बाह्य प्राणायाम के अभ्यास से पाचन संस्थान को सुचारू,भूख में वृद्धि, कब्ज का निवारण, पाचन तंत्र संबंधी रोगों- गैस, कब्ज, एसिडिटी,मधुमेह आदि रोगों को दूर कर आमाशय, अग्नाशय, लिवर,स्प्लीन व आंतों का आरोग्य बढ़ाता है।
स्नायू संस्थान के आरोग्य के लिए सर्वांगासन,हलासन,सूर्य-नमस्कार,शीर्षासन,बकासन,पर्वतासन के साथ अनुलोम-विलोम,कपालभातीं,भ्रामरी, उदगीथ प्राणायाम, शवासन, योगनिद्रा के अभ्यास से स्नायु तन्तुओं को सबल एवं सक्रिय रखना,मानसिक क्षमता में वृद्धि,पार्किंसन,स्नायु दुर्बलता रोगों को दूर करना, योग से डर, भय, निराशा, तनाव,चिंता के भावों में कमी एवं उत्साह, रुचि, निर्भयता व प्रसन्नता के भावों में वृद्धि होती है।
श्री गिरि नें व्याख्याताओं से कहा कि इन योगासनों व प्राणायाम के अभ्यासों को अच्छे से आत्मसात कर अपने- अपने विद्यालयों के युवाओं-किशोरों को ठीक ढ़ंग से बतावें ताकि वे स्वस्थ्य रहते हुए अपनी पढ़ाई कर सकें।
