VIDEO – महाकालेश्वर मंदिर जहाँ मुर्दे की भस्म से होती है महाकाल का श्रृंगार और दर्शन मात्र से होती है मोक्ष की प्राप्ति…
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महाकालेश्वर के इतिहास के बारे में बात करें तो बता दें कि सन 1107 से लेकर 1728 तक उज्जैन में यवनों का शासन रहा था। इस शासन काल में लगभग हिंदुओं की प्राचीन परम्पराएं लगभग नष्ट हो गई थी। इसके बाद मराठो ने 1690 में मालवा क्षेत्र में हमला कर दिया था। फिर 29 नवंबर 1728 में मराठा शासकों ने मालवा में अपना शासन कर लिया था। इसके बाद उज्जैन की खोया हुआ गौरव और चमक फिर से वापस आई इसके बाद यह साल 1731 से 1728 के बाद यह मालवा मालवा की राजधानी बनी रही। मराठो के अधिपत्य के समय यहां पर 2 बड़ी घटनाए हुई। पहली घटना यह थी कि पहले यहां पर स्थित महाकालेश्वर मंदिर का फिर से निर्माण किया गया और ज्योतिर्लिंग की ख़ोई हुई प्रतिष्ठा वापस मिली। इसके अलावा यहाँ सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना की गई जो बेहद खास उपलब्धि थी। आगे चलकर इस मंदिर का विस्तार राजा भोज द्वारा किया गया।
पुराण के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर बहस हुई थी, कि सृष्टि में सर्वोच्च कौन है। उनका परीक्षण करने के लिए भगवान शिव ने तीनों लोकों में प्रकाश के एक अंतहीन स्तंभ को ज्योतिर्लिंग के रूप में छेदा और इसके बाद भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा क्रमशः प्रकाश के अंत का पता लगाने के लिए, स्तंभ के साथ नीचे और ऊपर की ओर यात्रा करते हैं। लेकिन ब्रह्मा जी झूठ बोल देते हैं कि उन्हें अंत मिल गया और विष्णु हार मान लेते हैं। फिर शिव प्रकाश के स्तंभ के रूप में प्रकट होते हैं और ब्रम्हा जी को श्राप देते हैं कि उनका किसी भी समारोहों में कोई स्थान नहीं होगा, जबकि विष्णु जी की अनंत काल तक पूजा होगी।