पश्चिमी घाट की पुण्यभूमि, आस्था–इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम
महाबळेश्वर (महाराष्ट्र)।
पश्चिमी घाट की हरी-भरी वादियों में स्थित महाबळेश्वर केवल एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सनातन आस्था का जीवंत केंद्र है। यह वही पावन भूमि है जहाँ भगवान शिव स्वयं रुद्राक्षाकार स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह शिवलिंग ब्रह्मा–विष्णु–महेश के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

पंचगंगा मंदिर से निकलती हैं पाँच पवित्र नदियाँ
महाबळेश्वर में स्थित ऐतिहासिक पंचगंगा मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। यहीं से गौमुख के माध्यम से पाँच पवित्र नदियाँ—
कृष्णा, वेन्ना, कोयना, सावित्री और गायत्री—प्रकट होती हैं।
पुराणों में वर्णन है कि श्रापवश त्रिदेव और देवियों ने नदियों का रूप धारण किया, जिससे यह स्थल अत्यंत पवित्र माना जाता है।
छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत
महाबळेश्वर की यह भूमि केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण दिया। आज भी यहाँ उनकी आस्था और दूरदर्शिता की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।

जहाँ शिव विश्राम करते हैं, वहाँ आस्था कभी नहीं सोती
शांत वातावरण, घने जंगल, पर्वतीय नज़ारे और शिवभक्ति की अनुभूति—महाबळेश्वर को एक अद्वितीय तीर्थ और पर्यटन स्थल बनाते हैं। देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक यहाँ न केवल प्राकृतिक सौंदर्य देखने आते हैं, बल्कि आध्यात्मिक शांति की तलाश में भी पहुँचते हैं।
महाबळेश्वर वास्तव में वह धरा है,
जहाँ प्रकृति, श्रद्धा और इतिहास एक साथ सांस लेते हैं।

इस दौरान छत्तीसगढ़ पत्रकार साथियों का एक दल महाबलेश्वर मंदिर दर्शन को पहुचा जहाँ पत्रकारों में शैलेष पाण्डेय, संजय शेखर, प्रमोद मिश्रा, राजेश राज, प्रदीप गुप्ता, सत्या सिंह राजपूत, खोमन साहू, जगजीत सिंह, प्रशांत सिंह, शिवम दुबे, वेदप्रकाश साहू, अद्वैत नायक, गौरव शुक्ला, संतोष कश्यप, शुभम वर्मा, श्रीकांत यद्, अखिलेश तिवारी और जनसंपर्क से आधिकारिक तौर पर हीरालाल देवांगन – संयुक्त संचालक, सौरभ शर्मा – उप संचालक, चन्द्रशेखर कश्यप – उप संचालक जगदलपुर, शशिरत्न पाराशर – उप संचालक धमतरी, सुनील कुमार – सहायक संचालक मौजूद रहें।
