Wednesday, April 14, 2021
अजब गजब अजब गजब - VIDEO - जटाशंकर धाम में...

अजब गजब – VIDEO – जटाशंकर धाम में होता हैं भोलेनाथ का 24 घंटे प्राकृतिक जलाभिषेक, 52 हाथ गुफा के भीतर जाने पर होता है भोलेनाथ का दर्शन

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00 दुर्गम वनक्षेत्र पार कर पहाड़ी में बनी गुफा के अंदर गुफा में स्थित है जटाशंकर मंदिर…

कोरिया / आस्था और भक्ति में जो ताकत होती है वह किसी और चीज में नही होती। इस आस्था और भक्ति का अद्भुत सामंजस्य दिखाई पड़ता है जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर जटा शंकर मंदिर में….

बता दे कि घनघोर जंगल में पहाड़ी के नीचे स्थित प्राचीन शिवमंदिर जटाशंकर हैं। दुर्गम वन, पगडंडियों, विकट पथरीली रास्तो को पार कर पहाड़ी के अंदर लगभग 52 हाथ अंदर घुटनों और कोहनियों के बल पर चलकर अंदर भगवान भोलेनाथ के दर्शन पहुंचा जा सकता है।

जटा शंकर धाम, कोरिया छत्तीसगढ़

इस प्राचीन शिव मंदिर जटा शंकर धाम को लेकर काफी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि शिवरात्रि और सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं का जबरदस्त तांता लगा रहता है। न केवल कोरिया जिले से वरन् आसपास के जिलों से श्रद्धालु अपने परिवार के साथ यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव की विधिवत पूजा अर्चना करते हैं।

इस प्राचीन शिव मंदिर में पहुंचने के लिये सिर्फ पैदल जाने का ही मार्ग है। तकरीबन 450 सीढ़ियों से गुजर कर फिर मंदिर जाने के लिये 52 हाथ अंदर घुटनों और कोहनियों के बल पर चलकर अंदर भगवान भोलेनाथ के दर्शन पहुंचा जा सकता है।

इस मंदिर का नाम जटाशंकर पड़ने के पीछे शिव की प्राचीन शिवलिंग में जटाओं जैसी आकृति साफ दिखाई पड़ती है।

गुफा के अंदर गुफा वाले इस मंदिर से कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, इस संबंध में मंदिर के महंत शिवप्रसाद दास ने बताया कि जटाशंकर का इतिहास काफी पुराना है। जब भगवान शिव भस्मासुर के डर से पहाड़ियों के अंदर जाकर छुप गये थे तब उनकी जटाओं के अवशेष पत्थरों में बन गये जो आज भी देखे जा सकते हैं। वहीं इस मंदिर में प्रगट हुई भगवान शिव की मूर्ति के ऊपर कुदरती रूप से जल की बूंद लगातार अपने आप गिरती है।

एक ओर जहां भगवान शिव का 24 घंटे प्राकृतिक रूप से जलाभिषेक होते रहता है वहीं यहां आने वाले श्रद्धालुओं को भी बारहों महीने प्राकृतिक रूप से पहाड़ से रिसा हुआ जल पीने के लिये मिलता है। वहीं यह जल इतना ठंडा होता है कि इसमें नहाने से लोगों को कपकपी छूटने लगती है। इसी जल का उपयोग श्रद्धालु पूजा, पाठ, अनुष्ठान के अलावा भोजन प्रसाद बनाने में भी करते हैं।

इस प्राचीन एवं दुर्गम शिव मंदिर में पहुंच मार्ग न होने के कारण श्रद्धालुओं को काफी परेशानी होती है। वहीं श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने पर इस बात की भी हैरानी होती है कि यहां प्रकाश की कोई व्यवस्था नही है क्योंकि यहां तक बिजली आई ही नही।

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