रायपुर / धर्मांतरण का जब जिक्र होता है तो सबसे पहले बस्तर और फिर सरगुजा याद आता है, थोड़ा और पीछे जाएँगे तो आपको नारायणपुर की कुछ धुंधली हो चुकी तस्वीरे याद आ जाएँगी। साथ ही गाँव में बवाल और तत्कालीन एसपी का सर फोड़ देना जैसी तमाम चीज़े पर चर्चा आज इसलिए फिर शुरू हुई क्योंकि रायपुर से कुछ किलोमीटर दूर मैदानी इलाके में भी धर्मांतरण का खुला प्रयास हो रहा था।
जी हाँ ये पूरा मामला बस्तर और सरगुजा से नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की राजधानी से सटे ग्राम पंचायत पथरी का हैं। जहाँ खुलेआम धर्मांतरण कराने के लिए पम्पलेट बना कर घर-घर वितरण किया गया हैं और लोगों से अपील की गई कि आप अपना धर्म छोड़ ईसाई धर्म अपना ले। हालांकि ग्रामीणों को जब तक यह बात समझ आती तब तक धर्मांतरण में शामिल लोग भाग खड़े हुए।
धर्मांतरण के मुद्दे की अहमियत को समझने पर आप साफ तौर पर समझ सकेंगे कि बीजेपी के केंद्रीय नेताओं से लेकर स्थानीय नेता भी पिछली कांग्रेस की सरकार को बुरी तरह घेरते रही हैं और नतीजा विधानसभा चुनाव में सरकार बदल गई थी। अब सत्ता में भाजपा है और मुख्यमंत्री भी आदिवासी चेहरे के रूप में विष्णुदेव साय हैं। लेकिन धर्मांतरण की आग अब भी छत्तीसगढ़ के तमाम इलाकों में धधक रही है, सुलग रही है और इसकी धुंध छंटी नहीं है।
बता दे कि राज्य की करीब 32 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। इनमें सरगुजा, बस्तर के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के लिए धर्मांतरण बहुत बड़ा मुद्दा है। 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2.55 करोड़ है। जिनमें इसाइयों की संख्या 4.90 लाख है। यानी ईसाई कुल आबादी के 1.92 फ़ीसदी हैं। राज्य में रोमन कैथोलिक वर्ग की जनसंख्या 2.25 लाख और मेनलाइन चर्च, जिसमें चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया, मेनोनाइट्स, ईएलसी, लुथरन आदि शामिल हैं, इनकी जनसंख्या 1.5 लाख है।