रोहिणी नक्षत्र और अन्य शुभ योगों के बीच मनेगा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, जानिए पूजन सामग्री और धार्मिक मान्यताएं
नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव इस वर्ष 4 सितंबर 2026 को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों और घरों में तैयारियां शुरू हो गई हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा, भोग और दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस वर्ष पर्व के दौरान जयंती योग, रोहिणी नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे शुभ संयोग बनने की बात कही जा रही है।
पूजा में इन सामग्रियों का करें इस्तेमाल
जन्माष्टमी के दिन बाल गोपाल की पूजा में तुलसी पत्र का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को हरसिंगार और वैजयंती या पीले फूल अर्पित किए जा सकते हैं। पूजा स्थल पर मोर पंख रखना भी शुभ माना जाता है।
भक्त बाल गोपाल को सुंदर झूले में विराजमान कराकर उनका श्रृंगार कर सकते हैं। चांदी की छोटी बांसुरी भगवान को अर्पित करने की भी परंपरा है। इसके अलावा श्रीकृष्ण और बलराम को रक्षा सूत्र बांधने की धार्मिक परंपरा भी कई स्थानों पर निभाई जाती है।
आर्थिक परेशानी के लिए बताए जाते हैं ये उपाय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी की शाम तुलसी के पौधे की 11 बार परिक्रमा करते हुए ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप किया जा सकता है। राधा-कृष्ण मंदिर में वैजयंती या पीले फूलों की माला अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।
घर में गाय-बछड़े की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा भी कुछ धार्मिक मान्यताओं में बताई गई है। इसे सुख-समृद्धि और संतान संबंधी मनोकामनाओं से जोड़कर देखा जाता है।
संकट निवारण के लिए मंत्र और अभिषेक
मनोकामना पूर्ति और संकट निवारण के लिए जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करने की परंपरा है। इस दौरान श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार ‘ॐ नमः भगवते वासुदेवाय’ सहित अन्य कृष्ण मंत्रों का जाप कर सकते हैं।
बाल कृष्ण के स्वरूप का दूध से अभिषेक करने की भी परंपरा है। इसके लिए शंख का प्रयोग किया जाता है। पूजा के बाद भगवान को माखन-मिश्री, मिश्री, सफेद मिठाई और मेवा मिश्रित खीर का भोग लगाया जा सकता है।
दान-पुण्य का भी विशेष महत्व
जन्माष्टमी के अवसर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल, अनाज और जरूरत की अन्य वस्तुओं का दान करने की धार्मिक परंपरा है। श्रद्धालु मंदिर में जाकर दान-पुण्य कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सेवा, दान और भक्ति के साथ जन्माष्टमी मनाने से पर्व का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
नोट: ऊपर बताए गए उपाय धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार या आर्थिक समाधान नहीं माना जाना चाहिए।
