हाइकोर्ट के आदेशों की ‘अवमानना’ का रिकॉर्ड बना रही सरकार, 80-90 साल के बुजुर्गों की पेंशन-ग्रेच्युटी पर चला ‘तुगलकी फरमान’ का बुलडोजर
रायपुर
छत्तीसगढ़ में बुजुर्गों के सम्मान और ‘सुशासन’ की ऐसी अनोखी परिभाषा गढ़ी जा रही है, जिसे देखकर इतिहास के सबसे बेरहम हुक्मरान भी शरमा जाएं। सूबे के जिन सेवानिवृत्त प्राध्यापकों ने कक्षा में चॉक-डस्टर घिसकर प्रदेश को आईएएस, आईपीएस, न्यायाधीश, मंत्री और विधायक दिए—आज सरकार ने उन्हें बुढ़ापे की लाठी तोड़कर ‘गुरु दक्षिणा’ भेंट की है।
विष्णुदेव साय सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने ऐसा ऐतिहासिक कमाल कर दिखाया है कि पिछले 40 सालों से मिल रही पेंशन पर एक झटके में कैंची चला दी। 1 और 11 सितंबर 2026 को जारी सरकारी फरमानों ने 400 से अधिक वयोवृद्ध प्राध्यापकों और तृतीय-चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की पेंशन व ग्रेच्युटी को ‘अवैध’ मानते हुए बंद कर दिया।
‘हक मांगा तो रोटी भी छीनी’—अदालत की जीत की सजा
मामला दरअसल यह था कि 70 से 90 बसंत देख चुके ये बुजुर्ग प्राध्यापक छठे वेतनमान के अनुरूप अपने जायज हक के लिए अदालत गए थे। माननीय उच्च न्यायालय ने 80 से ज्यादा याचिकाओं में इनके पक्ष में फैसला सुनाया। सरकार सुप्रीम कोर्ट तक भागी, लेकिन वहां भी मुंह की खानी पड़ी। कोर्ट में 50 से अधिक अवमानना याचिकाएं लंबित हैं।
अदालत से हारने के बाद सरकार ने गजब की प्रशासनिक हठधर्मिता दिखाई। सरकार ने सोचा—‘तुम हमसे बढ़ा हुआ वेतनमान मांगोगे? रुको, हम तुम्हारी पुरानी पेंशन ही बंद किए देते हैं!’ कैबिनेट ने 2010 के ऐतिहासिक फैसलों को पलटते हुए सीधे पेंशन की सांसों पर ही ताला जड़ दिया। हद तो यह कि जुलाई और अगस्त की पेंशन भी ‘खजाने की हिफाजत’ के नाम पर रोक ली गई।
दवा की जगह दमन: बीपी, हार्ट और घुटनों के दर्द का ‘इलाज’ किया बंद
महासंघ के अध्यक्ष डॉ. हरिनारायण दुबे और महासचिव डॉ. डी.एन. शर्मा ने भारी मन से व्यथा बताई कि 80-90 साल की उम्र में जहां बुजुर्गों को दवा, तीमारदारी और सम्मान की जरूरत होती है, वहां सरकार ने उनके सामने जीवन-मरण का संकट खड़ा कर दिया है। बीपी, डायबिटीज और हार्ट की गोलियां खरीदने के पैसे भी अब बुजुर्गों की जेब से छीन लिए गए हैं।
खजाने पर भारी पड़े लाचार गुरुजी
प्रदेश में करोड़ों के तामझाम, फिजूलखर्ची और आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली हुकूमत को शायद अपना राजकोषीय घाटा इन 400 लाचार बुजुर्गों की पेंशन से ही पूरा होता दिख रहा है। ‘गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु’ के नारे लगाने वाली व्यवस्था ने साफ संदेश दे दिया है—“जब तक जवानी थी, तब तक हमने आपसे पढ़ा; अब जब आप लाठी टेक रहे हैं, तो सड़क पर आइए!”
अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयीन पेंशनभोगी प्राध्यापक संघ ने दो-टूक कहा है कि यदि सरकार ने यह अमानवीय और दमनकारी आदेश तत्काल वापस नहीं लिया, तो सरकार को यह याद रखना होगा कि लाचार बुजुर्गों की सिसकियां किसी भी सत्ता की नींव हिलाने के लिए काफी होती हैं।
