कोरिया / कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के इस संघर्ष भरे माहौल में एक ओर पलायन, बढ़ती बेरोजगारी का आतंक लोगों को हलाकान कर रहा है वन्ही श्री रन साय जैसे मूल कोरियावासी अपने खेतों में लगी सब्जी और फसल की देखरेख में व्यस्त हैं। मूलतः आदिवासी यह परिवार अपना और अपने आस-पास के चार आदिवासी परिवारों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराकर आर्थिक रूप से सम्बल प्रदान कर रहा है।
इस परिवार की हमेशा से ऐसी स्थिति नही थी कि यह खुद के साथ दूसरे की भी मदद कर पाते। पहले इनके ढाई एकड़ खेतों में बमुश्किल एक फसल अनाज होता था, बेचने की बात तो दूर साल भर खाने को भी पूरा नही हो पाता था। ऐसे में मजबूर होकर इस परिवार को दूसरे जगहों पर काम मांगने जाना पड़ता था। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत परिवार के 100 दिन पूरे होने के बाद अधिकांश समय ऐसा होता था कि मांगने पर भी गांव में काम नही मिल पाता था। ऐसे ही समय में एक दिन रनसाय ग्राम सभा में जा पँहुचे वँहा इन्हें मनरेगा के तहत बनने वाली डबरी के बारे में जानकारी मिली। इन्होंने ग्राम पंचायत में सरपंच के सामने अपने खेतों में डबरी बनाने का प्रस्ताव रखा। इनकी मांग के आधार पर ग्राम पंचायत को निर्माण एजेंसी बनाकर जिला पंचायत द्वारा डबरी निर्माण स्वीकृत किया गया। 1 लाख 78 हजार रुपए की लागत से वर्ष 2017 में इनकी डबरी बनकर तैयार हो गई। इस डबरी में काम करके इनके परिवार को लगभग 20 हजार रुपए भी मिले।
डबरी बन जाने से पहली ही बारिश में इनके ढाई एकड़ खेतों में सिचाई के लिए पानी उपलब्ध हो गया। इसके बाद इस परिवार ने पीछे नही देखा। मेहनत करके इन्होंने अपने अगल बगल के चार परिवार को तैयार कर सभी के खेत में घेराव कर लिया। डबरी बनने के बाद जिन खेतों में साल भर खाने का अनाज नही होता था,वँहा 30 क्विंटल धान की फसल हुई। इसके बाद रनसाय के बेटों ने सारे खेतों में टमाटर और बरबटी के साथ खीरे की फसल लगाई। इस तरह दो वर्ष खेती करके ही यह परिवार अपने सारे कर्ज उतारकर आर्थिक रूप से मजबूत होने लगा। रामतोष ने बताया की बीते बरस 58 हजार का टमाटर उन्होंने बाजार में बेचा था। इसके बाद डबरी में हमेशा पानी बनाए रखने के लिए सौर सुजला के तहत एक बोरिंग भी उसी में कराया है। अब सिचाई के लिए बिजली की चिंता दूर हो गई है। संतोष कहते हैं की इस साल धान की अच्छी उपज हुई तो घर में 10 क्विंटल रखकर 22 क्विंटल धान सहकारी समिति में भी बेचकर लगभग 50 हजार रुपए मिल गए। सब्जी की फसल इस बार हर महीने होने वाली बेमौसम बारिश से खराब हुई है। इसके बाद भी सिर्फ करेले को बाजार में बेचकर ढाई हजार रुपए हर सप्ताह मिल ही जाते हैं। उन्होंने बताया की गुरुवार को 1200 से 1400 रुपए पोड़ी बाजार में मिल जाते हैं फिर टेडमा बाजार में मंगलवार को भी 12- 14सौ रुपए का लाभ हो जाता है। सन्तोष ने बताया की इस बार बारिश के पहले वह डबरी में उन्नत किस्म की मछली का बीज डालेंगे जिससे उन्हें 60 से 70 हजार रुपए सालाना मिलने लगेगा।
यह कहानी कोरिया जिले के जनपद पंचायत खड़गंवा मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत बैमा की है। यह कोरिया और सूरजपुर जिले के प्रेमनगर विकासखंड के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित है। मेहनत करने के लिए पहचाने जाने वाले गोंड आदिवासी समुदाय के रनसाय की उम्र लगभग 65 वर्ष हो चली है। अब थोड़े कमजोर होने के कारण वह खेती तो नही कर पाते परन्तु बेटों को आर्थिक रूप से सक्षम पाकर वह काफी प्रसन्न रहते हैं। रनसाय के कुछ खेतों में करेले की और कुछ में उड़द की फ़सल लगी हुई है। डबरी में मछली पकड़ने का जाल भी डाल रखा है। इससे उन्हें हर एक दो दिन में पौष्टिक आहार के रूप में घर की मछली का पर्याप्त मांस भी उपलब्ध हो जाता है। श्री रनसाय के दो बेटे हैं रामतोष और संतोष। उनके दो बेटों और बहुओं के भरे पूरे संयुक्त परिवार में 10 सदस्य हैं। डबरी रूपी सिंचाई का साधन पाकर सभी आनन्द से जीवन गुजार रहे हैं।
तूलिका प्रजापति(सीईओ जिला पंचायत) रनसाय का परिवार, जँहा चाह वँहा राह का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने महात्मा गांधी नरेगा से जुड़कर उचित लाभ लेते हुए सही जगह पर डबरी बनवा ली। जिससे उनके खेतों में सिंचाई का साधन और परिवार को निश्चित रोजगार से आजीविका का स्थायित्व मिल गया। अब वह परिवार खुद के साथ अपने आस पास के किसानों को भी सम्बल प्रदान कर रहा है। जिले में मनरेगा से ऐसी 900 डबरियाँ बनाई जा रही हैं जो आने वाले समय में ग्रामीण परिवारों को रनसाय के परिवार की तरह स्थाई आजीविका से जोड़ने का शसक्त माध्यम बन जाएंगी।
