प्रकृति और पशुधन के संरक्षण का संदेश देता है गोवर्धन पूजा पर्व, घरों से मंदिरों तक सजती हैं गोवर्धन की आकृतियां, श्रद्धालु लगाते हैं परिक्रमा और अर्पित करते हैं छप्पन भोग
दीपावली की जगमगाहट के बाद गोवर्धन पूजा का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण, पशुधन और अन्न के महत्व को भी रेखांकित करता है। इस दिन घरों के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। उसे फूलों, पत्तियों और रंगों से सजाकर भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में पूजा जाता है। इसके साथ ही अन्नकूट महोत्सव का आयोजन होता है, जिसमें तरह-तरह के पकवान तैयार कर भगवान को भोग लगाया जाता है।
गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने की अनूठी परंपरा
गोवर्धन पूजा की सबसे खास परंपरा गोबर से पर्वत की आकृति तैयार करना है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गोवर्धन पर्वत भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। घरों के आंगन, छत या खुले स्थान पर गोबर से पर्वत बनाया जाता है। इसके आसपास गाय, बछड़े, ग्वाल-बाल, पेड़-पौधों और अन्य प्राकृतिक आकृतियों को भी दर्शाया जाता है। फूलों, पत्तियों, रोली और अक्षत से सजावट के बाद विधि-विधान से पूजा की जाती है। श्रद्धालु गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।
इंद्र के अहंकार को तोड़ने से जुड़ी है परंपरा
गोवर्धन पूजा के पीछे भगवान श्रीकृष्ण की एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। मान्यता है कि ब्रजवासी पहले वर्षा के देवता इंद्र की पूजा करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि गोवर्धन पर्वत, प्रकृति, वनस्पति और गौवंश उनके जीवन तथा आजीविका के वास्तविक आधार हैं। इसलिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
इससे नाराज होकर इंद्रदेव ने ब्रज में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सात दिनों तक ब्रजवासियों तथा उनके पशुओं को उसके नीचे सुरक्षित आश्रय दिया। अंततः इंद्रदेव को अपनी भूल का एहसास हुआ। इसी प्रसंग को गोवर्धन पूजा की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
अन्नकूट में सजता है पकवानों का भव्य भोग
गोवर्धन पूजा का दूसरा प्रमुख आकर्षण अन्नकूट महोत्सव है। अन्नकूट का अर्थ है अन्न का समूह या ढेर। इस दिन घरों और मंदिरों में अनेक प्रकार के सात्विक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इनमें खीर, पूड़ी, मालपुआ, लड्डू, पेड़ा, जलेबी, हलवा, रबड़ी और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां शामिल होती हैं।
इसके अलावा मौसमी सब्जियों को मिलाकर विशेष मिक्स सब्जी तैयार की जाती है। माखन-मिश्री, दूध, दही, छाछ, फल और अन्य खाद्य पदार्थ भी भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं। कई मंदिरों में 56 प्रकार के व्यंजनों से छप्पन भोग सजाने की परंपरा है।
भोग के बाद प्रसाद वितरण, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश
गोवर्धन पूजा में भोग अर्पित करने से पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप प्रज्वलित कर पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद तुलसी दल सहित विभिन्न पकवान अर्पित किए जाते हैं और आरती की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद प्रसाद श्रद्धालुओं और परिवार के सदस्यों में वितरित किया जाता है।
गोवर्धन पूजा की परंपरा हमें यह संदेश देती है कि मानव जीवन प्रकृति, अन्न, जल और पशुधन पर निर्भर है। इनका संरक्षण और सम्मान करना ही इस पर्व की मूल भावना है। यही वजह है कि गोवर्धन पूजा आज भी धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर बनी हुई है।
