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SECL को 25000 का लगा जुर्माना, नेत्रहीन श्रमिक के साथ प्रबंधन कर रहा था अन्याय

कोरिया / कोल इंडिया की मनिरत्न कहे जाने वाली एसईसीएल कम्पनी के कामगार कोयला उत्पादन में रात दिन अपना खून पसीना एक कर देते है पर दुर्भाग्य है कि उनके शारीरिक रूप से अक्षम होते ही एसईसीएल प्रबंधन श्रमिकों को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंकते है। ताजा मामला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है।

आपको बता दे कि चरचा कॉलरी का श्रमिक करलू राम कार्य के दौरान आंख में चोट लगने की वजह से उसकी दोनों आंखों की रोशनी समाप्त हो गई थी। उसके आँखों का इलाज कालरी प्रबंधन द्वारा विभिन्न जगहों में भेजकर विभागीय खर्चे से इलाज भी करवाया गया, किंतु आंखों में रोशनी वापस नहीं आ सकी।

जिसके बाद कोरिया जिला के जिला मेडिकल बोर्ड द्वारा करलू राम को सौ प्रतिशत नेत्रहीन होने का प्रमाण पत्र भी दे दिया गया। एसईसीएल के विभागीय चिकित्सकों के द्वारा भी जांच कर उसे नेत्रहीन कहा गया। पूरी तरह अंधा होने की वजह से गरीब श्रमिक करलू राम अपनी ड्यूटी नहीं कर सकता था और पैसों के अभाव में दाने-दाने को मोहताज हो गया। हालात कुछ ऐसे हुए की घर में मजदूरी करने वाला कोई दूसरा सदस्य न होने की वजह से उसे कई दिनों भूखे भी रहना पड़ा।

करलू राम के द्वारा वर्ष 2015 में भी कालरी प्रबंधन के समक्ष आवेदन कर अपनी शारीरिक अक्षमता की जांच की मांग की गई, किंतु मजबूर श्रमिक के आवेदन को कूड़े के ढेर में डाल दिया गया। पूरी तरह नेत्रहीन श्रमिक कालरी दफ्तर के चक्कर लगाता – लगाता थक गया। इस पर सामाजिक कार्यकर्ता नीरज गुप्ता के द्वारा सहयोग से माजिद अली अधिवक्ता उच्च न्यायालय के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर न्याय की मांग की गई। जिस पर डब्ल्यू पी एस नंबर 3049 वर्ष 2017 में उच्च न्यायालय द्वारा एसईसीएल को निर्देशित किया गया कि 4 महीने की अवधि में श्रमिक की शारीरिक अक्षमता की जांच कर शेष कार्यवाही पूरी की जाए, उसके वावजुद एसईसीएल प्रबंधन की मनमानी जारी रही और 4 महीने की अवधि जनवरी 2018 में गुजर जाने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस पर विवश होकर श्रमिक के लिए अधिवक्ता माजिद अली ने पुनः उच्च न्यायालय में याचिका डब्ल्यू पी एस नंबर 44 4 5 वर्ष 2018 दायर की। जिस पर 19 जुलाई 2018 को न्यायालय ने कड़ी फटकार लगाते हुए 2 महीने के अवधि के अंदर श्रमिक की शारीरिक अक्षमता की जांच करने एवं सेवा संबंधी कार्यवाही पूरी करने का आदेश दिया गया। आदेश में कोल इंडिया के चेयरमैन को स्वयं इस प्रकरण के संबंध में दिशा निर्देश देने हेतु कहा गया, किंतु उच्च न्यायालय के इस आदेश के बावजूद एसईसीएल प्रबंधन अपनी मनमानी पर अड़ा रहा।

माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा दो अलग-अलग तिथियों में आदेश देने के बावजूद एसईसीएल प्रबंधन द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। एकल पीठ के द्वारा दिए गए आदेश के क्रियान्वयन के संदर्भ में उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच जिसमें माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व न्यायाधीश ने तत्पश्चात wA no.713/2018 के प्रति आदेश दिनांक 26 सितंबर 2018 को गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए उल्लेखित किया कि अपने जीवन का मुख्य भाग कंपनी के सेवा में लगा देने के बावजूद सहयोग ना मिलना बेहद सोचनीय है। पब्लिक सेक्टर के अंडरटेकिंग कंपनी के कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास मानवीय संवेदना व सहानुभूति नहीं है जो उचित नहीं है। इस कार्यशैली के प्रति 25000 का जुर्माना एससीसीएल के ऊपर लगाया जाता है। गरीब श्रमिक को एसईसीएल प्रबंधन 4 सप्ताह के समय सीमा के अंदर ₹25000 का भुगतान करेगी। साथ ही 30 दिनों की अवधि के अंदर उसकी शारीरिक क्षमता की जांच व शेष कार्यवाही की जावेगी।

माननीय उच्च न्यायालय के इस आदेश से नेत्रहीन श्रमिक कल्लू राम को पूरी उम्मीद है कि उसे न्याय मिलेगा। न्यायालय के आदेश से करलू राम व उसके परिजनों में फिलहाल हर्ष व्याप्त है।

विदित हो कि एसईसीएल में सैकड़ों की संख्या में ऐसे श्रमिक भी है जो कार्य के दौरान चोट लगने की वजह व अन्य कारणों से बिस्तर में पड़े रहने को मजबूर हैं। इन असहाय श्रमिकों के द्वारा निरंतर आवेदन करने के बावजूद एसईसीएल प्रबंधन द्वारा शारीरिक अक्षमता की जांच हेतु मेडिकल बोर्ड का गठन नहीं किया जाता और न्यायालय में गलत तर्क दिया जाता है कि जब मेडिकल बोर्ड का गठन होगा तब जांच करेंगे। मेडिकल बोर्ड के गठन की कोई समय सीमा या अवधि निर्धारित नहीं की जाती जिससे यह श्रमिक असहाय स्थिति में रहते हुए स्थिति में रहते हुए धीरे-धीरे काल के गाल में समा जाते हैं।

उच्च न्यायालय के अधिवक्ता माजिद अली ने बताया कि नेशनल कोल वेजेज एग्रीमेंट के तहत कोल इंडिया में कार्यरत ऐसे कर्मचारी जो शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हैं उनके आश्रितों एवं उत्तर अधिकारियों को उनके स्थान पर रोजगार दिए जाने का प्रावधान है यदि विभाग उनके आश्रितों को नौकरी देने में उदासीनता बरती है तो माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष अपने मौलिक अधिकार के क्रियान्वयन हेतु याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं इसके पूर्व मानवीय दृष्टिकोण के तहत पब्लिक सेक्टर की कार्यशैली के विरुद्ध जनहित में कई निर्णय न्यायालय द्वारा दिए गए हैं, जिससे पीड़ित परिजन लाभान्वित होते रहे हैं।

इस पूरे मामले में सामाजिक कार्यकर्ता नीरज गुप्ता की भी तारीफ करनी पड़ेगी चुकी उनकी पहल व सहयोग से ही करलू राम को न्याय मिल सका है। नेत्रहीन श्रमिक सब जगह प्रयास कर थक हार चुका था तभी उस स्थिति में माजिद अली अधिवक्ता उच्च न्यायालय का भरपूर सहयोग पा कर नीरज ने एसईसीएल प्रबंधन की मनमानी के विरोध में डट के खड़े हुए और गरीब मजदूर के लिए आवाज उठाया।

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