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राज्यपाल ने दी थी विदाई की शुभकामनाएं, कुछ घंटे बाद मिला एक्सटेंशन का आदेश ?

मुख्य सचिव को सेवा विस्तार पर मुहर – लेकिन ‘राजभवन’ रहा अंधेरे में!

पूरे घटनाक्रम से महामहिम की किरकिरी, अब बना सियासी चर्चा का विषय

रायपुर, छत्तीसगढ़ में मुख्य सचिव अमिताभ जैन को सेवा विस्तार दिए जाने का फैसला भले ही प्रशासनिक स्थिरता की दृष्टि से लिया गया हो, लेकिन इसके घोषणा के तरीके ने संवैधानिक मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, इस फैसले की जानकारी प्रदेश के राज्यपाल रमेन डेका को ही नहीं दी गई, और वे इसे सार्वजनिक सूचना के माध्यम से ही जान सके।

सूत्रों के मुताबिक, सोमवार सुबह राजभवन में अमिताभ जैन ने राज्यपाल से शिष्टाचार भेंट की थी, जहां उन्हें सेवानिवृत्ति की औपचारिक बधाई दी गई। राज्यपाल ने न केवल उन्हें राजकीय गमछा और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया, बल्कि उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं भी दीं। इस मुलाकात को मुख्य सचिव की ‘विदाई भेंट’ के रूप में देखा गया।

लेकिन कुछ ही घंटे बाद बदल गई तस्वीर…

दूसरे पहर में हुई कैबिनेट की बैठक में नए मुख्य सचिव की नियुक्ति की ख़बरे प्रदेश भर में तैर रही थी, पर इन सबके बीच एक ऐसी खबर आई जिसने सबको चौका दिया कि अमिताभ जैन को तीन महीने का सेवा विस्तार दिया जा रहा है ख़बर फिर हवा में तैरने लगी, अब ख़बर ऐसी थी तो इंतज़ार हुआ सरकारी आदेश का फिर क्या था ख़बरों के बाज़ार के बीच तक़रीबन साढ़े तीन घंटे बाद आदेश आया श्री जैन के सेवा विस्तार का।
फिर क्या था इस उलटफेर ने सभी को चौंका दिया, और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि राज्यपाल को इस निर्णय की पूर्व जानकारी नहीं दी गई थी।

संवैधानिक मर्यादाओं पर सवाल

छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्य में मुख्य सचिव पद को लेकर लिया गया कोई भी निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं होता, वह संवैधानिक प्रक्रिया का भी हिस्सा होता है। ऐसे में राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को अंधेरे में रखा जाना गंभीर संकेत देता है। कई वरिष्ठ पूर्व नौकरशाहों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह राजभवन की ‘अनदेखी’ मात्र नहीं, बल्कि संविधानिक परिपाटी के विरुद्ध एक असहज संकेत है।

अब किरकिरी बनी चर्चा का विषय

मुख्य सचिव की इस ‘ विदाई’ और बाद में हुई ‘पुनर्नियुक्ति’ की खबर ने न केवल प्रशासनिक बल्कि राजनीतिक हलकों में भी ‘किरकिरी’ की स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह मामला अब राजभवन की गरिमा और सरकार के संवाद तंत्र पर सवाल बनकर उभरा है।

खैर मुख्य सचिव के सेवा विस्तार को लेकर लिया गया निर्णय अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन जिस तरीके से उसे लागू किया गया, उसने सरकार और राजभवन के बीच समन्वय की कमी को उजागर कर दिया है।


अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस ‘किरकिरी’ पर सरकार की कोई सफाई आती है या यह मामला यूं ही चर्चाओं में बना रहेगा।

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