पुणे। महाराष्ट्र, महाराष्ट्र की ऐतिहासिक पहचान बना शनिवार वाडा केवल एक किला नहीं, बल्कि मराठा साम्राज्य के उत्कर्ष, राजनीतिक षड्यंत्रों और त्रासद घटनाओं की जीवंत गाथा है। पेशवाओं की राजधानी रहा यह ऐतिहासिक वाडा आज भी अपने खंडहरों, विशाल द्वारों और लोककथाओं के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है।

शनिवार वाडा का निर्माण
वर्ष 1732 में मराठा साम्राज्य के महान पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा कराया गया था। शनिवार के दिन इसकी नींव रखे जाने के कारण इसे शनिवार वाडा कहा गया। यह वाडा पेशवाओं का प्रमुख प्रशासनिक और आवासीय केंद्र था। अपने समय में यह सात मंजिला भव्य महल था, जिसमें लकड़ी और पत्थर की सुंदर नक्काशी, विशाल दरबार हॉल, बगीचे, फव्वारे और मंदिर हुआ करते थे। उस दौर में शनिवार वाडा को भारत के सबसे भव्य राजमहलों में गिना जाता था।

पेशवा बाजीराव प्रथम और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में शनिवार वाडा मराठा साम्राज्य की शक्ति और रणनीति का केंद्र बना। यहीं से साम्राज्य के विस्तार की योजनाएं बनाई जाती थीं और महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसले लिए जाते थे। लेकिन सत्ता के साथ यहां पारिवारिक कलह, राजनीतिक साजिशें और विश्वासघात की घटनाएं भी सामने आईं।

शनिवार वाडा की सबसे चर्चित और दर्दनाक घटना पेशवा नारायणराव की हत्या से जुड़ी है। वर्ष 1773 में सत्ता की लालसा में उनके चाचा रघुनाथराव ने हत्या की साजिश रची। कहा जाता है कि हत्या के समय नारायणराव ने मदद के लिए पुकारते हुए कहा था, “काका… मला वाचवा!” यानी “चाचा… मुझे बचाओ!” यह घटना शनिवार वाडा के इतिहास पर एक गहरा और काला अध्याय बन गई।

लोक मान्यताओं के अनुसार आज भी अमावस्या की रातों में शनिवार वाडा में नारायणराव की चीखें सुनाई देने की बात कही जाती है। इसी कारण यह स्थान रहस्य और भय से जुड़ी कहानियों के लिए भी प्रसिद्ध है और इसे महाराष्ट्र के सबसे रहस्यमयी स्थलों में गिना जाता है।

वर्ष 1828 में शनिवार वाडा में भीषण आग लग गई, जिसमें इसकी अधिकांश लकड़ी की संरचना जलकर नष्ट हो गई। इसके बाद पेशवाओं का शासन समाप्त हो गया और यह भव्य महल धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो गया। हालांकि पत्थर से बने मजबूत किलेबंदी और विशाल द्वार आज भी इसके गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं।
आज शनिवार वाडा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है और पुणे आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है। यह वाडा मराठा इतिहास, सत्ता संघर्ष और लोककथाओं का ऐसा संगम है, जो अतीत की गौरवगाथा और त्रासदी दोनों को एक साथ दर्शाता है।
छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र पहुची शैक्षणिक भ्रमण के दौरान पत्रकार साथियों में शैलेष पाण्डेय,
संजय शेखर, प्रमोद मिश्रा, राजेश राज, प्रदीप गुप्ता, सत्या सिंह राजपूत, खोमन साहू, जगजीत सिंह, प्रशांत सिंह, शिवम दुबे, वेदप्रकाश साहू, अद्वैत नायक, गौरव शुक्ला, संतोष कश्यप, शुभम वर्मा, श्रीकांत यद्, अखिलेश तिवारी और जनसंपर्क से आधिकारिक तौर पर हीरालाल देवांगन – संयुक्त संचालक, सौरभ शर्मा – उप संचालक, चन्द्रशेखर कश्यप – उप संचालक जगदलपुर, शशिरत्न पाराशर – उप संचालक धमतरी, सुनील कुमार – सहायक संचालक मौजूद रहें।
