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सुर्खियाँ बटोरने के लिए बाघों का आयात, पर अपने ही स्वस्थ बाघ को भूल गया वन विभाग


रायपुर | 30 जनवरी
छत्तीसगढ़ वन विभाग शीघ्र ही मध्य प्रदेश से बाघों का आयात कर उन्हें गुरु घासीदास–तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व और उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व में छोड़ने की तैयारी में है। इसके लिए शिकार प्रजातियों—हिरण आदि—को विभिन्न चिड़ियाघरों और अटारी स्थित नंदनवन जंगल सफारी से लाकर जंगलों में छोड़ने की योजना भी बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, आयातित बाघों को सॉफ्ट रिलीज़ देने के लिए गुरु घासीदास–तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व में लगभग एक हेक्टेयर का एन्क्लोजर भी तैयार किया जा रहा है।


लेकिन इसी बीच एक बेहद चिंताजनक और विरोधाभासी तथ्य सामने आया है—वन विभाग अपने ही यहां मौजूद एक पूरी तरह स्वस्थ हो चुके बाघ को जंगल में छोड़ने के प्रति उदासीन बना हुआ है और उसे अब भी कैद में रखा गया है।


पूरी घटना इस प्रकार है
अप्रैल 2025 में बीजापुर वन मंडल में एक बाघ शिकारियों द्वारा लगाए गए लोहे के फंदे में फँसकर गंभीर रूप से घायल हो गया था। विभागीय निष्क्रियता के चलते बाघ लगभग 20 दिनों तक फंदे के साथ घूमता रहा, जिससे उसकी हालत और बिगड़ गई। बाद में उसे इलाज के लिए नंदनवन जंगल सफारी, रायपुर लाया गया। 30 जुलाई 2025 को उसकी एक जटिल लेकिन सफल सर्जरी की गई।


सर्जरी के लगभग चार महीने बाद, नवंबर 2025 में विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम द्वारा की गई विस्तृत जांच में बाघ को क्लिनिकली स्वस्थ, सक्रिय और पूरी तरह चलने-फिरने में सक्षम पाया गया।


चार विशेषज्ञ चिकित्सकों की जांच रिपोर्ट
डॉ. पियूष दुबे, डॉ. संतोष आदिल, डॉ. पी. के. चंदन और डॉ. जे. के. जाडिया की रिपोर्ट के अनुसार:
00 सर्जरी का घाव पूरी तरह भर चुका है और वहां दोबारा बाल उग आए हैं।
00 बाघ घायल पैर पर पूरा वजन डाल पा रहा है और पंजे की पकड़ सामान्य है।
00 चलने, दौड़ने या उठने में दर्द के कोई लक्षण नहीं हैं।
00 दोनों पिछले पैरों पर शरीर का पूरा वजन संभाल पा रहा है।

00 धीरे चलने पर कभी-कभी हल्की लंगड़ाहट दिखती है, लेकिन दौड़ते समय कोई लंगड़ाहट नहीं होती।
00 बाघ नियमित रूप से भोजन कर रहा है और उसकी शारीरिक क्षमता संतोषजनक है।

00 सर्जरी में लगाए गए इम्प्लांट निकालने की फिलहाल कोई चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं है।

भूल गया वन विभाग
रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने आरोप लगाया कि विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा स्पष्ट रूप से स्वस्थ घोषित किए जाने के बावजूद दो महीने बीत जाने के बाद भी वन विभाग ने इस बाघ को उसके उपयुक्त प्राकृतिक आवास में सॉफ्ट रिलीज़ करने की कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। न कोई समय-सीमा तय की गई है और न ही कोई आधिकारिक पहल दिखाई दे रही है।


उन्होंने कहा कि जब डॉक्टर लिखित रूप में बाघ के पूरी तरह स्वस्थ होने की पुष्टि कर चुके हैं, तो एक दिन की भी अनावश्यक देरी उसके प्राकृतिक अधिकारों और वन्यजीव संरक्षण के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।


कोर्ट से क्यों छुपाई गई इस टाइगर की जानकारी?
नितिन सिंघवी के अनुसार, नवंबर 2024 में कोरिया जिले में बाघ के शिकार के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की थी। इसके बावजूद 27.10.2025 और 10.12.2025 को अदालत में यह कहा गया कि किसी नई पोचिंग की जानकारी नहीं है, जबकि अप्रैल 2025 में बीजापुर में यह गंभीर पोचिंग की घटना हुई थी और वही बाघ बाद में जंगल सफारी में रखा गया।


उन्होंने आरोप लगाया कि यह मामला प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) के संज्ञान में था, फिर भी न्यायालय से यह तथ्य छुपाया गया। उन्होंने कहा कि यह न केवल न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय में पारदर्शिता की गंभीर कमी को भी उजागर करता है।


सुर्खियों की दौड़ बनाम संरक्षण की जिम्मेदारी
सिंघवी ने आरोप लगाया कि वन विभाग मध्य प्रदेश से बाघ लाने की योजना के प्रचार-प्रसार में सुर्खियाँ बटोरने में लगा है, जबकि अपने ही यहां मौजूद स्वस्थ बाघ को जंगल में लौटाने में घोर उदासीनता दिखाई जा रही है।


उन्होंने कहा कि जब बाघ लाने के लिए संसाधन, बाड़े और योजनाएं बनाई जा सकती हैं, तो एक स्वस्थ बाघ को उसके प्राकृतिक आवास में लौटाने में इतनी बेरुखी क्यों?


उन्होंने मांग की कि इस बाघ को तत्काल उपयुक्त जंगल में सॉफ्ट रिलीज़ किया जाए। वन्यजीव प्रदर्शन की वस्तु नहीं हैं—उन्हें प्राकृतिक जीवन का अधिकार दिया जाना चाहिए। अन्यथा यह मामला संरक्षण नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और नैतिक विफलता का प्रतीक बन जाएगा।

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