रायपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों दल-बदल का खेल भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। नेता कब किस पाले में खड़े नजर आएं और अगली पारी किस झंडे के नीचे खेलें, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है। इसी सियासी उठापटक के बीच सतनामी समाज के प्रमुख धर्मगुरु गुरु बालदास के परिवार से निकली एक नई राजनीतिक खबर ने चर्चाओं को और हवा दे दी है।
गुरु बालदास के बड़े बेटे और प्रदेश के मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई ढाल दास ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। रायपुर स्थित पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निवास पर आयोजित कार्यक्रम में ढाल दास ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। भूपेश बघेल ने उन्हें कांग्रेस का गमछा पहनाकर पार्टी में स्वागत किया। यानी एक तरफ परिवार में भाजपा का सत्ता वाला झंडा लहरा रहा है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस का हाथ भी उसी परिवार के आंगन में पहुंच गया है।
कभी कांग्रेस, फिर भाजपा और अब परिवार में कांग्रेस की वापसी
इस कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय खुद गुरु खुशवंत साहेब की राजनीतिक यात्रा है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। भाजपा के टिकट पर उन्होंने आरंग विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और पिछली कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे शिव कुमार डहरिया को चुनाव में शिकस्त दी।
इसके बाद सत्ता बदली और गुरु खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में मंत्री बन गए। अब उसी परिवार के बड़े भाई ढाल दास ने कांग्रेस में प्रवेश कर लिया है। ऐसे में सियासी गलियारों में सवाल भी उठ रहा है—परिवार एक, विचारधारा दो और राजनीतिक रास्ते अलग-अलग… आखिर ये राजनीति है या लोकतंत्र का पारिवारिक पैकेज?
भाई सत्ता में, बड़े भाई विपक्ष के खेमे में
ढाल दास के कांग्रेस में आने के बाद राजनीतिक तंज का बाजार भी गर्म है। एक भाई भाजपा सरकार में मंत्री है, जबकि बड़े भाई ने कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया है। यानी घर में अगर राजनीतिक बहस हो तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की आवाज एक ही परिवार से सुनाई दे सकती है।
हालांकि भारतीय राजनीति में अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा रखना कोई नई बात नहीं है। कई परिवारों में अलग-अलग दलों से जुड़े लोग रहे हैं। लेकिन यहां मामला इसलिए खास है क्योंकि यह परिवार सतनामी समाज और छत्तीसगढ़ की राजनीति में महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव रखता है।
मुंगेली से चुनाव लड़ने के संकेत
कांग्रेस में शामिल होने के बाद ढाल दास ने अपने राजनीतिक इरादों को भी साफ संकेत दे दिया है। उन्होंने कहा कि जनता सब जानती है कि भाजपा क्या कर रही है। उनसे जब पूछा गया कि क्या वह कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ेंगे, तो उन्होंने हामी भरी।
मुंगेली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मुंगेली से या पार्टी जहां से चयन करेगी, वहां से चुनाव लड़ेंगे। यानी कांग्रेस का गमछा अभी नया-नया है, लेकिन चुनावी मैदान की तैयारी के संकेत पुराने खिलाड़ी जैसी स्पष्टता से दिए जा चुके हैं।
भाई से चर्चा हुई या नहीं? सवाल भी दिलचस्प, जवाब उससे भी ज्यादा
ढाल दास से जब पूछा गया कि कांग्रेस में आने से पहले उन्होंने अपने छोटे भाई और भाजपा सरकार के मंत्री गुरु खुशवंत साहेब से विचार-विमर्श किया था या नहीं, तो इस सवाल ने भी राजनीतिक दिलचस्पी बढ़ा दी।
ढाल दास ने खुद को “अलख निरंजन व्यक्ति” और “गुरु” बताते हुए जवाब दिया। उनके इस अंदाज ने भी चर्चाओं को जन्म दे दिया। अब सियासत में सवाल यह नहीं कि भाई-भाई अलग-अलग दलों में क्यों हैं, बल्कि सवाल यह है कि क्या दोनों अपने-अपने राजनीतिक रास्ते पर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी होंगे या परिवार और राजनीति के बीच कोई अलग संतुलन कायम रहेगा?
सतनामी समाज की सियासत पर नजर
गुरु बालदास का सतनामी समाज में प्रभाव माना जाता है। ऐसे में उनके परिवार से जुड़े इस राजनीतिक घटनाक्रम को केवल एक व्यक्ति के दल बदलने के रूप में नहीं देखा जा रहा। कांग्रेस इसे अपने लिए सामाजिक और राजनीतिक मजबूती के तौर पर देख सकती है, जबकि भाजपा के लिए यह निश्चित तौर पर सोचने का विषय हो सकता है।
एक तरफ गुरु खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में मंत्री के तौर पर सक्रिय हैं, तो दूसरी तरफ उनके बड़े भाई ढाल दास कांग्रेस के मंच पर खड़े होकर आगामी चुनाव में कांग्रेस के लिए मैदान में उतरने की इच्छा जता रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में सतनामी समाज के बीच इस परिवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी खूब चर्चा होना तय माना जा रहा है।
सियासत का नया फॉर्मूला—घर में भाईचारा, मैदान में मुकाबला!
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि घर का रिश्ता अपनी जगह और राजनीति का रिश्ता अपनी जगह। भाई सत्ता पक्ष में है, बड़ा भाई विपक्ष में। एक ने कांग्रेस से भाजपा का सफर तय कर सत्ता तक पहुंच बनाई, तो दूसरे ने अब भाजपा से कांग्रेस की ओर राजनीतिक कदम बढ़ा दिया।
अब आने वाले चुनाव में अगर ढाल दास मुंगेली से कांग्रेस के उम्मीदवार बनते हैं और गुरु खुशवंत साहेब भाजपा के लिए मैदान में उतरते हैं, तो राजनीतिक मंच पर सवालों की कमी नहीं होगी। हालांकि दोनों अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ेंगे, लेकिन चर्चाओं में मुकाबला केवल सीटों का नहीं, सियासी विचारधाराओं और परिवार के दो राजनीतिक चेहरों का भी होगा।
कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में यह घटनाक्रम यही संदेश दे रहा है कि सियासत में न कोई स्थायी दोस्त होता है, न स्थायी दुश्मन और अब तो एक ही परिवार में भी स्थायी पार्टी सदस्यता की गारंटी नहीं! कल तक जिस परिवार का एक चेहरा भाजपा के साथ सत्ता की कुर्सी पर था, आज उसी परिवार का दूसरा चेहरा कांग्रेस के मंच पर खड़ा है।
अब असली परीक्षा चुनाव के मैदान में होगी—कांग्रेस का हाथ ढाल दास के लिए कितना मजबूत सहारा बनता है और भाजपा में मंत्री पद संभाल रहे गुरु खुशवंत साहेब के राजनीतिक प्रभाव के सामने यह नया सियासी समीकरण कितना असरदार साबित होता है। फिलहाल इतना जरूर है कि गुरु परिवार के दो राजनीतिक रास्तों ने छत्तीसगढ़ की सियासत में एक नया सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—“घर में रिश्ते वही रहेंगे, लेकिन चुनावी मंच पर झंडे किसके-किसके होंगे?”
