Advertisement Carousel

साय कैबिनेट में फिर फेरबदल की हवाबाजी! कुर्सियां बेकरार, मंत्री होशियार… कौन रहेगा इन, कौन होगा आउट?

Oplus_16908288


रायपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत में एक बार फिर कैबिनेट फेरबदल की हवा चल पड़ी है। हवा ऐसी कि अभी तक पत्ते ही हिल रहे हैं, लेकिन सियासी गलियारों में कई नेताओं की धड़कनें जरूर बढ़ गई हैं। कोई इसे महज राजनीतिक हवाबाजी बता रहा है तो कोई इसे “ऑपरेशन कैबिनेट री-शफल” की शुरुआती घंटी मान रहा है।

फिलहाल सरकार की तरफ से ऐसा कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन राजनीति में चर्चा का अपना ही विज्ञान होता है—जहां धुआं दिखे, वहां सियासी चाय जरूर चढ़ जाती है!

कुर्सी पर बैठे मंत्री, लेकिन नजर दरवाजे पर!

फेरबदल की चर्चा उठते ही सबसे ज्यादा उत्सुकता उन मंत्रियों में होगी जिनके विभागों को लेकर पहले से राजनीतिक चर्चा होती रही है। अब मामला सिर्फ इतना नहीं कि कौन मंत्री रहेगा? बल्कि सवाल यह भी है कि किसका विभाग बदलेगा, किसका कद बढ़ेगा और किसका विभाग देखकर मंत्री जी खुद पूछेंगे—“ये मेरे पास कब आया?”

राजनीति में विभाग बदलना भी कम दिलचस्प नहीं होता। कल तक जिस विभाग की फाइलें देखकर चेहरे पर मुस्कान आती थी, कल वही विभाग देखकर माथे पर शिकन आ सकती है।

फेरबदल हुआ तो सिर्फ कुर्सियां बदलेंगी या समीकरण भी?

अगर कैबिनेट में बदलाव होता है तो मामला सिर्फ मंत्रियों की कुर्सी तक सीमित नहीं रहेगा। क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रदर्शन, संगठन से तालमेल और आने वाले चुनावी समीकरण भी तराजू पर तौले जा सकते हैं।

यानी सियासी भाषा में कहें तो कैबिनेट में म्यूजिकल चेयर शुरू हुई तो संगीत बंद होते ही किसकी कुर्सी बचती है, यही असली खेल होगा।

अभी हर मंत्री अपनी कुर्सी पर पूरी गंभीरता से बैठा है। लेकिन राजनीति में कुर्सी जितनी स्थायी दिखती है, उतनी होती नहीं। इसलिए इन दिनों शायद कई मंत्री अपने विभाग की फाइलों से ज्यादा सियासी कैलेंडर देख रहे हों!

दिल्ली की तरफ भी टिकी निगाहें

छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़े फैसलों को केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में रायपुर में फेरबदल की चर्चा हो और दिल्ली का नाम न आए—ऐसा तो सियासत में संभव ही नहीं।

अब अगर दिल्ली से कोई बड़ा संदेश आता है तो रायपुर में चर्चा की रफ्तार ऐसी हो सकती है कि चाय की दुकान से लेकर राजनीतिक ड्राइंग रूम तक एक ही सवाल—“भाई, कुछ पता चला?”

और जवाब भी वही पुराना—
“अंदर की खबर है… लेकिन अभी पक्की नहीं है!”

दावेदारों की नींद और चर्चाकारों की मौज

मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा नेताओं के लिए भले चिंता का विषय हो, लेकिन राजनीतिक चर्चाकारों के लिए यह किसी त्योहारी सीजन से कम नहीं।

कौन अंदर आएगा, कौन बाहर जाएगा, किसका विभाग बदलेगा, किसका कद बढ़ेगा—इन सवालों पर रायपुर की सियासी चौपालों में खूब माथापच्ची हो सकती है।

हालांकि, असली तस्वीर तभी साफ होगी जब सरकार या भाजपा संगठन की ओर से कोई आधिकारिक फैसला सामने आए।

फिलहाल हवाबाजी… लेकिन हवा में वजन कितना?

सबसे दिलचस्प बात यही है कि फेरबदल की चर्चा नई नहीं है। पहले भी ऐसी अटकलें कई बार उठ चुकी हैं और कई बार राजनीतिक बयानबाजी के बाद ठंडी भी पड़ गईं।

इसलिए फिलहाल इसे फैसला मान लेना जल्दबाजी होगी।

लेकिन राजनीति का मजा भी तो इसी में है—फैसला आने से पहले चर्चा गर्म, चर्चा के बीच कयास और कयासों के बीच नेताओं के चेहरे पढ़ने की कोशिश!

अब देखना यह है कि यह हवा सिर्फ मौसम की तरह आती-जाती है या सच में साय कैबिनेट की खिड़की-दरवाजे खोलकर कुछ कुर्सियों की जगह बदल देती है।

फिलहाल मंत्री जी कुर्सी पर हैं, कुर्सी मंत्री जी के नीचे है… लेकिन सियासत में दोनों को ही पता है—कुर्सी से ज्यादा मजबूत सिर्फ कुर्सी की चर्चा होती है!

error: Content is protected !!