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पद्म पुरस्कारों में गुमनाम नायकों को सम्मान

दिल्ली / देश में पहली बार मोदी सरकार ने राष्ट्र के असली नायकों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करने का फैसला किया है। खास बात ये भी है कि देश और समाज की सेवा में दशकों से लगे इन लोगों के बारे में खासतौर से आमलोगों ने अपनी सिफारिशें भेंजी थी। इस सूची में पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी से लेकर गुजरात के बनासकांठा के एक छोटे से गांव और केरल, त्रिपुरा और मणिपुर जैसे राज्यों के लोग शामिल हैं।
              पुरस्कारों के लिए 18000 नामांकन आए थे, जिसमें आखिरकार 89 दमदार लोगों का नाम तय किया गया। ऐसा पहली बार हुआ जब सरकार ने आम लोगों से अपनी सिफारिशें भेजने के लिए कहा। करीब 4000 लोगों ने ऑनलाइन सिफारिशें भेजीं थी और आखिरकार सर्वोत्तम उपलब्धि के साथ जन सेवा करनेवाले लोगों को पुरस्कार के लिए चुना गया। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा हों या फिर एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को पद्मविभूषण देने का फैसला हो। फैसला राजनीति और राज्यों के चुनाव के आधार पर नहीं बल्कि काबिलियत और नेतृत्व क्षमता के आधार पर किया गया है। सही मायने इसबार के पद्म पुरस्कार देश की विविधता की झलक प्रस्तुत कर रहा है। जिसमें चयन दिल्ली या फिर सरकार से नजदीकियों के आधार पर नहीं बल्कि उत्कृष्टता के आधार पर हुआ है।
             अनसंग हिरोज़ यानी देश के करीब डेढ दर्जन गुमनाम नायकों को इस बार पद्म श्री से सम्मानित किया जा रहा है। सात साल की उम्र में अखाड़े में उतरकर तलवार थामनेवाली 76 साल की मीनाक्षी अम्मा केरल में युद्ध कला कलारीपयत्तु सीखाती हैं। उम्मीदों की बुनकर… स्कूल ड्रॉपआउट चिंताकिंडी मल्लेशम ने एक ऐसी मशीन बनाई जिससे परंपरागत पोचमपल्ली साड़ी बुनकरों को पहले के मुकाबले लगने वाला समय और मेहनत एक तिहाई रह गया। द ट्री मैन के नाम से मशहूर दरीपल्ली रम्मैया ने देश को हरा भरा बनाने को अपना सपना बना रखा है। उनका मिशन है देश में एक करोड़ पेड़ लगाना। बिपिन गणात्रा एक अग्निरक्षक के नाम से जाने जाते हैं। एक आग दुर्घटना में अपने भाई को गंवाने के बाद बिपिन लगातार एक स्वयंसेवी के तौर पर आग में फंसे लोगों की जानबचाने के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मरणोपरांत पुरस्कार पानेवाली डॉ सुनीति सोलोमन को एड्स के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए याद किया जाएगा। साल 1985 में उन्होंने पहली बार देश में एड्स के मामला ढूंढा था। एड्स के साथ जुड़ी सामाजिक बाधाएं इसके खिलाफ लड़ाई में उनके कदमों को रोक नहीं सकी। रोड दुर्घटनाओं के शिकार लोगों को तुरत मदद पहुंचाने वाले डॉ सुब्रतो दास को हाईवे का मसीहा भी कहा जाता है। उनका लाफलाईन फाउंडेशन करीब 4000 किलोमीटर के राजमार्ग पर अपनी सेवाएं दे रहा है। डॉ दादी के नाम से मशहूर 91 साल की डॉ भक्ति यादव गायनाकॉलोजिस्ट हैं। वो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में लगातार पिछले 68 सालों से मुफ्त में महिलाओं का ईलाज कर रही हैं। करियर के शुरुआत में ही उन्होंने एक अच्छी नौकरी छोड़र गरीब महिलाओं के ईलाज के लिए एक संगठन का दामन थामा था। गिरीश भारद्वाज को सेतु बंधु के नाम से जाना जाता है। पेशे से इंजीनियर गिरीश ने अबतक अपने स्रोतों से सूदूर ईलाकों में 100 से ज्यादा लो कॉस्ट यानी कम कीमतवाले पुल बनवाए हैं।
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