बीजापुर / सरकार के फरमान और जिला प्रसाशन की मनमानी से एक ओर जहाँ महिलाये गालियों और छेडछाड जैसे शब्दों से अपमानित हो रहे हैं वही इस शराब की दूकान की वजह से किसान अपनी परंपरागत खेती को छोड़कर मजदूरी करने और मजदूरी से मिले पैसों से अपने और अपने बीवी बच्चों का पेट पालने को मजबूर हैं, प्रसाशन को कईयों बार दिए गए आवेदन के कागज़ रद्दी बन कर रह गये हैं।
मान्झीपारा में आदिवासीयों की आय का एकमात्र जरिया खेती है, खेती पर ही इस इलाके के लोग निर्भर हैं। पुरखों से ये आदिवासी खेती का काम ही जानते हैं लेकिन एक सरकारी निर्णय, फरमान या मनमानी ने इन किसानो के लिए रोजी रोटी का संकट पैदा कर दिया है। किसान बताते हैं की शराबियों को कई बार मना करने के बाद भी वो नहीं मानते, सबसे ज्यादा नुक्सान इन पांच किसानो को हुआ है सोनधर मांझी, मेघनाद मांझी, रामधर मांझी, भिखारी मांझी, भिखारी नाईक शामिल है।
किसान अपनी व्यथा बताते हैं की जब भी ये खेतों में हल चलाने का प्रयास करते हैं तो जमीन में अंदर तक धंसे ये बोतल के टुकड़े इन्हें और इनके मवेशियों को घायल कर देते हैं, पिछले तीन साल से इन किसानो ने खेती नहीं की है। आने वाले कई सालों तक खेती के लायक अब इनकी जमीन रही नहीं है।
इस पूरे मामले को लेकर एक बार फिर धारण प्रदर्शन कर छेड़छाड़ और खेतों में बोतलों के टुकड़ों की सफाई और मुआवजे को लेकर प्रसाशन को ज्ञापन सौपा गया है। जिसमे पीड़ित महिलाओं और किसानो को जिला कांग्रेस ने समर्थन दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि शराब की दुकान की चलते असमाजिक तत्वों का जमावड़ा लगाता है। लड़कियां असुरक्षित महसूस करती हैं, शराब पीने के बाद लोग जहां तहां बोतलें फेंक देते हैं। जिसकी वजह से उन्हें खेत में काम करते वक्त भी परेशानी होती है क्योंकि उनकी जमीन शराब की बोतलों से भरी हुई है।”शराब की दुकान की वजह से उन्हें कई समस्याएं आ रही हैं।
