“पानी की एक-एक बूंद पर जनता का अधिकार है, फिर ये टैंकर किसके लिए बहाए गए?”
चिरिमिरी में पानी नहीं, भ्रष्टाचार बह रहा है!
मार्च-अप्रैल में RTI कहे – सिर्फ 70 टैंकर, हकीकत बोले – रोज़ 100 टैंकर!
सवाल ये है कि सच किस टंकी में डूबा पड़ा है?
एमसीबी, चिरिमिरी।चिरिमिरी नगर निगम में पानी के नाम पर बड़ा ‘तरल खेल’ चल रहा है। गर्मी में जहां आम जनता बूंद-बूंद को तरसी, वहीं नगर निगम के खास लोगों ने टैंकरों में भ्रष्टाचार भरकर लाखों की कमाई की।
आपको बता दे कि नगर पालिक निगम चिरिमिरी एक बार फिर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में है। इस बार मामला है गर्मी के मौसम में जनता को पानी उपलब्ध कराने के नाम पर चल रहे टैंकर बुकिंग घोटाले का, जिसमें केवल मार्च और अप्रैल 2025 में ही प्रतिदिन औसतन 100 से अधिक टैंकर पानी बेचे जाने की जानकारी सामने आई है, जबकि RTI में सिर्फ 70 ट्रिप का रिकॉर्ड दर्ज है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, केवल बड़ा बाजार स्थित ओवरहेड टैंक से ही प्रतिदिन 4 से 5 टैंकर पानी बुकिंग के नाम पर बेचा गया। इसके अतिरिक्त, नगर निगम और PHE के बोरवेल से भी अलग से टैंकरों द्वारा पानी की सप्लाई की गई। यह आपूर्ति चिरिमिरी के 40 वार्डों में व्यापक रूप से की गई।
वर्तमान स्थिति
मई और जून 2025 में यह सिलसिला थमा नहीं है, बल्कि और तेज़ हो गया है। अब प्रतिदिन 20 से 25 टैंकर पानी बुक किया जा रहा है, और इनकी रसीदें भी जारी हो रही हैं। मगर सवाल उठता है कि मार्च-अप्रैल की भीषण गर्मी के दौरान RTI में केवल 70 ट्रिप का ही आंकड़ा क्यों दर्शाया गया?
करोड़ों का नुकसान, गहरी मिलीभगत?
शंका जताई जा रही है कि एक तृतीय श्रेणी के कर्मचारी के माध्यम से इस घोटाले को अंजाम दिया गया है, जिसमें निगम को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है। बगैर अनुमति, फर्जी बुकिंग और नकली रसीदों के ज़रिए लगातार पानी की अवैध बिक्री की जा रही है।
RTI और जमीनी सच्चाई में भारी अंतर
जहां एक ओर नगर निगम का जवाब कहता है कि केवल 70 टैंकर पानी गर्मियों में वितरित किया गया, वहीं प्रत्यक्षदर्शियों और जल स्रोतों के आंकड़े बताते हैं कि यह संख्या 3000 ट्रिप से अधिक हो सकती है — यानी लाखों लीटर पानी का घोटाला।
अब जनता पूछ रही है: क्या माननीय उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाए?
जनता अब इस मुद्दे को लेकर संगठित हो रही है और आवाज़ उठा रही है कि इस घोटाले की जांच स्वतंत्र एजेंसी या माननीय उच्च न्यायालय की निगरानी में हो। सवाल ये भी है कि क्या लोकायुक्त या CBI जैसी एजेंसियों से इसकी जांच कराई जानी चाहिए?
