रायपुर |
छत्तीसगढ़ की आदिवासी बहुल क्षेत्रों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई साहीवाल गाय योजना पर अब सियासत गर्मा गई है। राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश के छह जिलों में 325 आदिवासी परिवारों को साहीवाल नस्ल की गायें दी जाएंगी। योजना का उद्देश्य महिलाओं को दुग्ध व्यवसाय से जोड़ना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना है। लेकिन अब यह योजना सियासी खींचतान की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल – “2003 से चल रहा है भाजपा का ‘गाय जुमला’”
कांग्रेस ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने कहा –
“भाजपा सरकार 2003 से ही आदिवासियों को गाय देने के नाम पर झूठे वादे करती आ रही है। पहले जर्सी गाय का वादा किया गया, अब साहीवाल की बात हो रही है। लेकिन आज तक किसी आदिवासी परिवार को एक भी गाय नहीं दी गई। यह महज चुनावी नाटक है।”
BJP का जवाब – “जनहित से कांग्रेस को एलर्जी है”
कांग्रेस के आरोपों पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने पलटवार करते हुए कहा –
“जनहित में काम करने से कांग्रेस को एलर्जी हो जाती है। उन्हें आदिवासियों की तरक्की पचती नहीं। झूठ बोलने की मास्टरी अगर किसी पार्टी को मिली है, तो वह कांग्रेस है। जनता अब इनके झूठे वादों को पहचान चुकी है और इनके बहकावे में नहीं आने वाली।”
वोट बैंक या विकास?
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह योजना वास्तव में आदिवासी महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ठोस पहल है या फिर चुनावी लाभ के लिए एक नया प्रयोग?
विपक्ष जहां इसे दिखावा बता रहा है, वहीं सरकार इसे “ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने वाला क्रांतिकारी कदम” बता रही है।
ग्राउंड पर निगरानी जरूरी
फिलहाल इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या साहीवाल नस्ल की यह गायें वास्तव में लाभार्थियों तक पहुंचती हैं या नहीं। अगर यह योजना जमीन पर ईमानदारी से लागू होती है, तो यह आदिवासी महिलाओं की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती है। लेकिन अगर यह भी कागजों में सिमट गई, तो विपक्ष को और हमले करने का मौका मिल जाएगा।
