रायपुर, 23 जुलाई।
छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा 2014 में करोड़ों की लागत से किए गए विश्व के पहले वन भैंसा क्लोनिंग प्रयोग का सच अब सामने आ रहा है — और वह असहज करने वाला है। ‘दीपआशा’ नाम की इस भैंस को कभी “वन भैंसा की ज़ेरॉक्स कॉपी” बताया गया था। लेकिन 11 साल बाद वैज्ञानिक जवाब से स्पष्ट हो गया है कि क्लोनिंग से शुद्ध वन भैंसा का निर्माण तकनीकी रूप से संभव ही नहीं था।
क्या है दीपआशा की कहानी?
दीपआशा का जन्म 12 दिसंबर 2014 को हरियाणा स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल में हुआ था। दावा किया गया कि यह भैंस, उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व की मादा वन भैंसा ‘आशा’ के सोमेटिक सेल से बनाई गई है। क्लोनिंग प्रक्रिया में दिल्ली के एक बूचड़खाने से प्राप्त घरेलू भैंस के अंडाशय का उपयोग हुआ।
इस प्रयोग पर लगभग 1 करोड़ रुपये का खर्च आया और इसके बाद 2018 में 2.5 करोड़ रुपये में नया रायपुर के जंगल सफारी में दीपआशा के लिए विशेष बाड़ा बनाया गया। लेकिन 7 वर्षों से यह ‘वन भैंसा’ VIP दर्शनों तक ही सीमित है — आम जनता के लिए नहीं।
क्लोनिंग तकनीक पर वैज्ञानिक प्रश्न
हाल ही में, मार्च 2025 में छत्तीसगढ़ वन विभाग ने हैदराबाद स्थित CSIR-Centre for Cellular and Molecular Biology (CCMB) से पूछा कि क्या बूचड़खाने से प्राप्त अंडाणु का उपयोग कर ‘शुद्ध वन भैंसा’ की ज़ेरॉक्स कॉपी क्लोनिंग से बनाई जा सकती है?
CCMB का उत्तर साफ है —
“आज की तकनीक से ऐसा पूर्णतः संभव नहीं है। क्लोन में माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mtDNA) घरेलू भैंस से आता है, अतः पूरी तरह जंगली भैंसे जैसी अनुवांशिक समानता नहीं लाई जा सकती।”
DNA रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं आई?
सूत्रों के अनुसार, दीपआशा का DNA नमूना सालों पहले CCMB हैदराबाद और वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट, देहरादून भेजा गया था। लेकिन रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई। वन्यजीव प्रेमी दावा करते हैं कि “सच सामने न आ जाए इसलिए रिपोर्ट दबा दी गई।”
रायपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सिंघवी वर्षों से दीपआशा की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना है:
“अगर दीपआशा दिखने में मुर्रा भैंस है, और वैज्ञानिक रूप से वह वन भैंसा नहीं मानी जा सकती, तो उसे कैद में क्यों रखा गया है? उसे मुक्त क्यों नहीं किया जाता?”
सिंघवी का यह भी कहना है कि यदि वह सिर्फ एक घरेलू मवेशी है, तो उसे जंगल सफारी में कैद रखना वन्य प्राणी अधिनियम का भी उल्लंघन हो सकता है।
11 साल बाद क्यों जागा विभाग?
वन विभाग से यह भी पूछा जा रहा है कि अगर ऐसी बुनियादी तकनीकी जानकारी (कि वन भैंसे की हूबहू क्लोनिंग संभव नहीं) 2014 में ही ले ली जाती, तो यह खर्च और भ्रम टाला जा सकता था। अब जबकि CCMB ने अपना जवाब भेज दिया है, DNA रिपोर्ट को सार्वजनिक करना और दीपआशा की स्थिति पर फैसला लेना वन विभाग की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है।
क्या दीपआशा को अब रिहा किया जाएगा?
जवाब स्पष्ट है — अगर वह वन भैंसा नहीं है, तो उसे वन्य प्राणी नहीं माना जा सकता। ऐसे में उसे कैद में रखने का कोई औचित्य नहीं है।
अब सवाल यही है:
क्या विभाग सच्चाई स्वीकार करेगा, या यह प्रयोग मात्र VIP मनोरंजन और “वैज्ञानिक दिखावे” तक ही सीमित रहेगा?
