रायपुर। बहुचर्चित झीरम घाटी हत्याकांड मामले में एनआईए कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद अब सुनवाई की अगली तारीख 5 सितंबर तय की गई है। मामले को लेकर फैसला आने की चर्चा के बीच एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एनआईए की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि जांच के दौरान षड्यंत्र के पीछे के लोगों तक पहुंचने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए।
बघेल ने कहा कि दरभा थाने में जिन लोगों के नाम पर एफआईआर दर्ज हुई, उनसे भी पूछताछ नहीं की गई। उन्होंने दावा किया कि एनआईए कोर्ट ने गुडसा उसेंडी का बयान लेने के निर्देश दिए थे, लेकिन उनका बयान भी नहीं लिया गया। बघेल के मुताबिक घटना के समय मौके पर मौजूद कई लोगों से भी पूछताछ नहीं हुई। उन्होंने कहा कि जब जांच ही सही तरीके से नहीं हुई तो अदालत का फैसला भी जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर ही होगा।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री रहते उन्होंने मध्य क्षेत्र की बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री के सामने यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि यदि केंद्र सरकार जांच नहीं कर पा रही है तो राज्य को जांच की जिम्मेदारी दी जाए। इसके बाद राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया था, लेकिन एनआईए हाईकोर्ट पहुंच गई। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और फैसला राज्य के पक्ष में आया, लेकिन तब तक उनकी सरकार चली गई। बघेल ने आरोप लगाया कि इसके बाद मौजूदा सरकार ने भी मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
सीएम साय ने किया पलटवार
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भूपेश बघेल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि बघेल पांच साल तक मुख्यमंत्री रहे। उस दौरान उन्हें झीरम घाटी मामले में कार्रवाई करनी चाहिए थी। सीएम ने कहा कि बघेल मुख्यमंत्री रहते झीरम कांड के प्रमाण अपने पास होने की बात कहते रहे, लेकिन केवल बोलते रहे। यदि उन्हें वास्तव में चिंता थी तो अपने कार्यकाल में कुछ ठोस कदम उठाना चाहिए था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि झीरम घाटी हमले में कांग्रेस ने अपने कई नेताओं को खोया है। इस मामले की सच्चाई सामने आना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अब मामले में 5 सितंबर को सुनवाई होगी।
सुरक्षा व्यवस्था पर भी बोले सीएम
नक्सलवाद समाप्त होने के बाद नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा को लेकर मुख्यमंत्री साय ने कहा कि सुरक्षा किसी व्यक्ति के राजनीतिक आधार पर तय नहीं होती। इसके लिए निर्धारित कमेटी होती है, जो समय-समय पर समीक्षा करती है। किसी व्यक्ति को सुरक्षा की आवश्यकता होने पर कमेटी की सिफारिश के आधार पर सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है।
