रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने प्रदेश के बाल एवं बालिका संरक्षण गृह और बाल संप्रेक्षण गृहों के नाम बदलकर उन्हें अधिक सकारात्मक और बालहितैषी पहचान देने की पहल की है। आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर औपचारिक संस्थागत नामों की जगह ऐसे नाम रखने का आग्रह किया है, जिनसे बच्चों में अपनत्व, आत्मसम्मान और सकारात्मकता की भावना विकसित हो।
आयोग ने जम्मू में बाल संरक्षण संस्थाओं के लिए प्रचलित ‘पलाश’ और ‘परिषा’ जैसे नामों का उदाहरण देते हुए छत्तीसगढ़ में भी स्थानीय भाषा, संस्कृति, प्रकृति, लोक परंपरा और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े गरिमापूर्ण नाम अपनाने की अनुशंसा की है।
आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि नाम तय करने में संबंधित संस्थाओं में रह रहे बच्चों, देखरेखकर्ताओं और अन्य हितधारकों से सुझाव लिए जाएं, ताकि बच्चे नई पहचान से भावनात्मक रूप से जुड़ सकें। विभाग से जिलों के प्रस्तावित नामों की सूची मंगाकर 21 सितंबर 2026 तक कार्रवाई की रिपोर्ट आयोग को देने का आग्रह किया गया है।
आयोग का मानना है कि संस्था का नाम बच्चों के मनोभाव और सामाजिक पहचान पर असर डालता है। ऐसे में यह पहल बाल संरक्षण गृहों को महज प्रशासनिक संस्थान के बजाय बच्चों के सुरक्षित, सम्मानजनक और सकारात्मक विकास के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में अहम कदम है।
