रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्राचीन श्री विरंचीनारायण मंदिर एवं नरसिंहनाथ मंदिर की बेशकीमती जमीन की कथित अवैध बिक्री का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। करीब 11वीं शताब्दी के इन प्राचीन मंदिरों की सार्वजनिक न्यास संपत्ति के कथित गबन, फर्जीवाड़े और नियम विरुद्ध बिक्री के मामले में न्यायालय पंजीयक, सार्वजनिक न्यास ने 29 सितंबर 2026 को अहम आदेश जारी किया है। न्यायालय ने संबंधित तहसीलदार को राजस्व अभिलेखों में सुधार करने और संबंधित थाने को नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश के बाद लंबे समय से विवादों में घिरी मंदिर की जमीन का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
पूरा मामला रायपुर के धरमपुरा स्थित खसरा नंबर 293/7 की 0.158 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता पत्रकार पंकज विश्वकर्मा के अनुसार, वर्ष 2022 में इस जमीन की बिक्री करीब 2.50 करोड़ रुपये से अधिक के बाजार मूल्य के बावजूद महज 21 लाख रुपये में करने का प्रस्ताव ट्रस्ट की बैठक में दर्ज किया गया था। आरोप है कि सार्वजनिक न्यास की इस संपत्ति को बेचने के लिए पंजीयक सार्वजनिक न्यास और प्रबंधक कलेक्टर रायपुर से अनिवार्य अनुमति भी नहीं ली गई।
ट्रस्ट की बैठक में नाम किसी और का, रजिस्ट्री किसी दूसरे के नाम!
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों के मुताबिक ट्रस्ट की बैठक में विजय जैन के बेटों सौरभ जैन और निखिल जैन के नाम पर जमीन खरीदने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन जमीन का विक्रय विलेख घनश्याम दानी के नाम पर पंजीकृत कराया गया। बैठक की कार्यवाही में अन्य प्रस्तावित खरीदारों के नाम और अलग-अलग कीमतों का भी उल्लेख किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया पर न्यायालय ने विचार किया।
धारा 14 के उल्लंघन पर न्यायालय की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने छत्तीसगढ़ लोक न्यास अधिनियम 1951 की धारा 14 का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक न्यास की अचल संपत्ति के विक्रय के लिए पंजीयक की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। बिना अनुमति किया गया हस्तांतरण विधि सम्मत नहीं है। आदेश में यह भी सामने आया कि राजस्व अभिलेखों में प्रबंधक कलेक्टर रायपुर का नाम त्रुटिपूर्ण तरीके से विलोपित किया गया था। न्यायालय ने इस संबंध में अभिलेख सुधारने के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री के जनदर्शन से न्यायालय तक पहुंचा मामला
पत्रकार पंकज विश्वकर्मा ने 8 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के जनदर्शन में दस्तावेजों के साथ शिकायत की थी। मुख्यमंत्री के निर्देश पर कलेक्टर गौरव सिंह ने मामले की जांच कराई और प्रकरण को सार्वजनिक न्यास न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता महंत राम आशीष दास ने दस्तावेजों और तर्कों के आधार पर पक्ष रखा।
अब न्यायालय के आदेश के बाद तहसीलदार और संबंधित पुलिस थाने की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। मंदिर की बेशकीमती संपत्ति की कथित अवैध बिक्री के मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
