रिपोर्ट / राकेश सिंह / 09753486167 ……..
00 बारिश ने बढ़ाई सफर में मुसीबत
00 खिड़की दरवाजे गायब
00 भगवान भरोसे यात्रियों की सुरक्षा
00 नियमों का कोई पालन नहीं
कोरिया / बारिश के मौसम में कोरिया जिले की बसों के यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वावजूद इसके यात्री सुविधा के लिए संबंधित प्रशासन गंभीर नहीं दिख रहा है। ऐसे में सफर के दौरान मौसम बिगड़ने पर यात्रियों को पानी की बौछारों को सहते हुए सफर करनी पड़ती है। सीट की तो ऐसी दुर्दशा है कि अगर यात्री तनिक भी चूके तो उनके कपड़े फट जाते हैं। अगर यात्रा के दौरान बस तेज रफ्तार में हिचकोले लेती है तो सीट पर बैठना दुश्वार हो जाता है। इलाके की कई बसें रखरखाव के अभाव में बारिश के दौरान टपक रही हैं।
जिले में संचालित हो रही यात्री बसों की हालत बेहद खराब है। यदि इन बसों का प्रशासन के द्वारा मुआयना किया जाए तो अधिकांश बसें शासन की गाइडलाइन में अनफिट बैठेंगी। लेकिन इसके बाद भी ऐसी खटारा बसों को परिवहन विभाग द्वारा लगातार फिटनेस सर्टिफिकेट जारी किया जाता रहा है। लगातार कही न कही बस हादसे रोजाना होते रहते है विभाग को जरूर इस पर ध्यान देने की जरुरत है ताकि उनके इलाके में ऐसी घटनाएं न हो वावजूद इसके विभाग सख्त रवैया नहीं अपना रहा है। जिस वजह से अभी भी बेहद खराब स्थिति की बसें बेधड़क विभिन्न रूटों पर दौड़ रही हैं।
खिड़कियां ही गायब हो गईं – कोरिया जिले रोजाना 100 से ज्यादा बसें विभिन्न मार्गों पर विविध क्षेत्र की ओर दौड़ती है। जरूरतमंद और जिनके पास दुपहिया वाहन नहीं हैं वे लोग इन्हीं बसों के सहारे सफर करते हैं। लेकिन प्रशासन की लापरवाही के चलते यह सफर यात्रियों के लिए इन दिनों संघर्षमय होता जा रहा है। कई बसों की छतों से पानी टपकता रहता है। ऐसे में यात्री सफर के दौरान गीले हो जाते हैं।
बसों में सफर करना हो रहा मुश्किल – कई बसों की खिड़कियां टूटी हैं। गर्मी में तो यात्रियों ने जैसे-तैसे इन असुविधाओं को सह लिया। लेकिन बरसात में यात्रियों के सब्र का बांध टूट गया है। बारिश में खिड़कियों पर कांच ही नहीं रहने से पानी भीतर घुसकर सीटों को गीला कर रहा है। जिससे बसों के भीतर बैठकर भी सफर करना यात्रियों के लिए मुश्किल हो रहा है।
भारी बारिश में टपकती रहती हैं बसें – यात्रियों के अनुसार शहर में चलनेवाली स्टार बसें भरी बारिश में यात्रियों को गीला होने से नहीं बचा पा रही हैं। कई बसों की छतें टपकती रहती हैं। ऐसे में यात्रियों का सीटों पर बैठना उनके भीगने का कारण बन जाता है।
दुर्घटना की आशंका – बसों में टपकता पानी दुर्घटना को भी निमंत्रण देता है। बसों में लगे इलेक्ट्रिक वायर को पानी छू जाने से यात्रियों को करंट लगने की आशंका बढ़ रही है। इनके अलावा कई बसों की दो-दो खिड़कियां गायब हैं। ऐसे में खिड़कियों के पास चार फिट की खुली जगह बन कर रह गई है। कई यात्री छोटे बच्चों के साथ सफर करते हैं। ऐसे में इन खुली जगहों से कभी-भी कोई भी बच्चा गिर भी सकता है।
यात्रियों का रुख ऑटो और टैक्सियों की ओर – बसों में होने वाली परेशानियों को देखते अब यात्रियों द्वारा ऑटो और टैक्सियों का सहारा लिया जा रहा है। यात्रियों का कहना है कि भले ही उन्हें इसके बदले ज्यादा किराया देना पड़े लेकिन बारिश से बचाव हो जाता है। जहां सिर्फ बसें ही चलती हैं, वहां मजबूरन यात्रियों को बसों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।
बसों के फिटनेस में यह जरुरी – दो सीटों के बीच लगभग डेढ़ फीट का अंतर, सीटें आरामदायक हों। हार्न तेज हो जो दूर तक सुना जा सके। बस के भीतर एल्युमिनियम की मोटा चादर का फ्लोर हो। दो गेट व इमरजेंसी गेट आवश्यक। खिड़कियों में कांच होना आवश्यक। बस के आगे तेज रोशनी के लाइट, बैक लाइट, इंडीकेटर। इसके साथ आगे सफेद, बगल में पीला और पीछे लाल रंग के रिफ्लेक्टर लगे होना अनिवार्य है।
भगवान भरोसे यात्रियों की सुरक्षा – जिले में सचांलित होने वाले बसों को देखकर लगता है कि यात्रियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाली कुछ बसें इतनी जर्जर हैं कि यात्रियों को हर समय खतरे का डर सताता है। इन बसों में सुविधाओं के नाम पर बैठने के लिए सिर्फ सीटें लगी हैं। इसकी भी हालत इतनी खराब है कि लंबी दूरी की यात्रा करने में यात्रियों को परेशानी होने लगती है। यात्रियों के मुताबिक बसों की रफ्तार इतनी अधिक होती है कि बसों की खिड़कियों से लेकर दरवाजे तक आवाज करने लगते हैं लेकिन वे इस बारे में कोई शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि उनके गांवों में चुनिंदा बसें ही चलती हैं। यदि विरोध करेंगे तो उनका आना-जाना मुश्किल हो जाएगा।
सुरक्षा के लिए ये है जरूरी – बसों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए प्रदेश शासन की ओर से गाइडलाइन तय की थी। इसके अनुसार बसों में दो दरवाजों के अलावा एक इमरजेंसी डोर भी होना चाहिए। यात्रियों को बैठने के लिए सुविधाजनक सीटें होना चाहिए। बस में त्वरित उपचार के लिए फर्स्ट एड किट होना चाहिए, जिससे दुर्घटना की स्थिति में लोगों को इलाज मिल सके। ड्राइवर-कंडक्टर एक निश्चित यूनिफार्म में नजर आना चाहिए, जिससे उनकी पहचान की जा सके। बस पर ड्राइवर का मोबाइल नंबर भी लिखा होना चाहिए। इसके अलावा बसों पर परिवहन विभाग द्वारा जारी फिटनेस प्रमाण पत्र भी लगाया जाना था। लेकिन जिले में इन नियमों का कोई पालन नहीं हो रहा है।
