00 वनमंडल में हाथी के मौत के बाद डीएफओ का हो चुका है स्थांतरण
रायपुर सरगुजा / सरगुजा संभाग के बलरामपुर वनमंडल के प्रभारी डीएफओ को लेकर सरगुजा वनवृत इन दिनोंं चर्चा में है। कई आईएफएस कतार में होने के बावजूद बलरामपुर वनमंडल का प्रभार प्रभारी डीएफओ लक्ष्मण सिंह को सौंप दिया गया, जबकि श्री सिंह का मूल पद एसडीओ है। हालांकि प्रभारी DFO लक्ष्मण सिंह को राज्य सरकार ने चुनौतीपूर्ण वन मंडल में भेजा है। तभी तो उन्होंने पदभार संभालते ही सारे परिक्षेत्र अधिकारियों की बैठक लेकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि काम में लापरवाही बर्दाश्त नही होगी।
ख़ैर आपको बता दे कि छत्तीसगढ़ राज्य में आईएफएस अफसरों की कमी नही है बावजूद राज्य शासन द्वारा एक SDO को प्रभारी डीएफओ बनाये जाने से निश्चित ही कई आईएफएस अफसर उपेक्षित महसूस कर रहे होंगे।
गौरतलब है कि बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के 6वें DFO के रूप में लक्ष्मण सिंह ने पदभार ग्रहण किया है। सरगुजा संभाग के राजपुर वन परिक्षेत्र में हथिनी की मौत के बाद राज्य शासन द्वारा पूर्व डीएफओ को जहां हटा दिया गया था। वहीं एसडीओ, रेंजर व अन्य कर्मचारियों को निलंबित किया गया था। तत्पश्चात राज्य शासन ने अम्बिकापुर में लघु वनोपज के उप प्रबंधक के रूप में पदस्थ लक्ष्मण सिंह को बलरामपुर वन मंडल में प्रभारी DFO के रुप मे पदस्थ किया है। पूरे सरगुजा संभाग में किसी एसडीओ को प्रभारी वनमंडलाधिकारी का प्रभार दिए जाने के बाद से विभाग में तरह – तरह के चर्चा से माहौल गर्म है।
सूत्रों की माने तो सरगुजा वनवृत में किसी भी वनमण्डल का बागडोर पाने वाले पहले प्रभारी DFO श्री सिंह मौके की तलाश में काफी पहले से ही थे। अब इसे संयोग ही कहे कि येन मौके पर हथिनी की मौत हो गई और शासन ने कड़ा एक्शन लेते हुए बलरामपुर वनमण्डल के तत्कालीन डीएफओ का स्थान्तरण कर दिया, उधर मौके की फिराक मे एसडीओ लक्ष्मणसिंह को मौका मिला और प्रभारी डीएफओ के लिए किस्मत आजमाई और सफल भी हो गए।
पर्दे के पीछे की कहानी की बात गर की जाए तो डीएफओ का पद मलाइदार माना जाता है। वन विभाग की गतिविधियों और कामकाज के सारे ऑर्डर डीएफओ के हस्ताक्षर से होते हैं। डीएफओ को फाइनेंस के सारे अधिकार हैं। वन मुख्यालय में सीएफ से ऊपर सीसीएफ एडिशनल पीसीसीएफ और पीसीसीएफ बैठे रहते हैं। इक्का-दुक्का सीएफ को छोड़कर बाकी अधिकारियों को केवल फाइल में ही सिर खपाना पड़ता है। उन्हें सीधे ऑर्डर करने का अधिकार ही नहीं रहता। यही वजह है कि ज्यादातर अफसर डीएफओ की कुर्सी छोडऩा भी नहीं चाहते।
जब इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत से कोरिया प्रवास के दौरान पत्रकारों ने सवाल किया तो उन्होंने मामले को छोटी मोटी बात बताते हुए रफादफा कर दिया। खैर इनसब बातों की वजह से यह साफ अनुमान लगाया जा सकता हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य में ढ़ेरों आईएफएस अफसर होने के बावजूद SDO को प्रभारी डीएफओ बनाया जाना राजनीति संरक्षण से ही सम्भव हो सका हैं।
