₹4.51 करोड़ की कथित वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों के बीच वायरल चैट ने बढ़ाई हलचल, संस्था प्रमुखों से सीधे जानकारी लेने के बजाय संकुल समन्वयकों पर क्यों भरोसा?
बलरामपुर। राकेश कनौजिया।
जिले के शिक्षा विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब सामग्री की उपलब्धता के प्रमाणपत्र को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि जिले के कई स्कूलों में संबंधित सामग्री पहुंची ही नहीं है, इसके बावजूद संकुल अकादमिक समन्वयक (CAC) के माध्यम से सामग्री उपलब्ध होने का प्रमाणपत्र तैयार कराने की कवायद की जा रही है। विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप की कथित चैट वायरल होने के बाद इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल और गहरे हो गए हैं।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव पर पहले से करीब 4 करोड़ 51 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता/गबन के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में सामग्री की उपलब्धता से जुड़े प्रमाणपत्रों को लेकर उठ रहे सवाल जांच की पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
सामग्री नहीं पहुंची तो प्रमाणपत्र किस आधार पर?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी स्कूल में सामग्री पहुंची ही नहीं, तो उसकी उपलब्धता का प्रमाणपत्र किस आधार पर तैयार किया जा रहा है? सामान्य तौर पर सामग्री की प्राप्ति और उपलब्धता की पुष्टि संबंधित संस्था प्रमुख, प्रधान पाठक या प्राचार्य के स्तर पर दर्ज रिकॉर्ड से होनी चाहिए।
आरोप है कि इसके बजाय CAC के माध्यम से उपलब्धता प्रमाणपत्र जुटाने की कोशिश की जा रही है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि विभाग संस्था प्रमुखों से सीधे जानकारी लेने से क्यों बच रहा है और संकुल स्तर पर प्रमाणपत्र तैयार कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
जांच के बीच वायरल चैट ने बढ़ाया विवाद
विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप की कथित बातचीत सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला और चर्चा में आ गया है। वायरल चैट में सामग्री की उपलब्धता से जुड़े प्रमाणपत्र को लेकर निर्देश और बातचीत होने का दावा किया जा रहा है।
यदि वायरल चैट वास्तविक पाई जाती है तो जांच के दौरान यह महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है। वहीं चैट में किसी तरह की छेड़छाड़ या एडिटिंग हुई है तो उसकी तकनीकी जांच भी जरूरी होगी। केवल वायरल चैट के आधार पर किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
कहीं रिकॉर्ड दुरुस्त करने की कोशिश तो नहीं?
विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि यदि रिकॉर्ड में सामग्री की उपलब्धता दर्शाने वाले प्रमाणपत्र तैयार हो जाते हैं, जबकि वास्तविकता में सामग्री संबंधित स्कूलों तक पहुंची ही नहीं, तो भविष्य में इन्हीं दस्तावेजों को सामग्री वितरण के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल विभागीय प्रक्रिया है या फिर पहले से चल रही वित्तीय अनियमितताओं की जांच के बीच रिकॉर्ड को मजबूत करने की कोशिश? हालांकि इस आशंका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
दस्तावेजों से लेकर स्कूलों तक हो भौतिक सत्यापन
पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए संबंधित स्कूलों का भौतिक सत्यापन सबसे अहम कड़ी साबित हो सकता है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि सामग्री की खरीद कब हुई, किस मद से भुगतान हुआ, किन स्कूलों के लिए सामग्री भेजी गई, परिवहन और वितरण का रिकॉर्ड क्या है तथा स्कूलों के स्टॉक रजिस्टर में उसकी एंट्री हुई या नहीं।
इसके साथ ही संबंधित संस्था प्रमुखों से अलग-अलग लिखित बयान लेकर रिकॉर्ड से मिलान किया जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।
अब असली सवाल—प्रमाणपत्र बनवाने के निर्देश किसके?
₹4.51 करोड़ की कथित वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों के बीच सामग्री उपलब्धता प्रमाणपत्र का यह विवाद शिक्षा विभाग के लिए नई चुनौती बन गया है। अब सवाल केवल सामग्री पहुंचने या नहीं पहुंचने का नहीं, बल्कि यह भी है कि CAC से प्रमाणपत्र तैयार कराने के निर्देश आखिर किस स्तर से दिए गए और विभाग ने संस्था प्रमुखों से सीधे जानकारी क्यों नहीं ली?
फिलहाल वायरल चैट, उपलब्धता प्रमाणपत्र और सामग्री वितरण से जुड़े दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की जरूरत है। जांच में यदि रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति में अंतर मिलता है तो मामला गंभीर हो सकता है। वहीं यदि सामग्री वास्तव में स्कूलों में उपलब्ध पाई जाती है, तो वायरल चैट और लगाए जा रहे आरोपों की भी उसी आधार पर जांच होनी चाहिए।
अब निगाहें शिक्षा विभाग और जांच अधिकारियों की कार्रवाई पर हैं। क्या स्कूलों का भौतिक सत्यापन होगा? क्या वायरल चैट की तकनीकी जांच कराई जाएगी? और क्या ₹4.51 करोड़ की कथित वित्तीय गड़बड़ी से जुड़े रिकॉर्ड की भी इस मामले के साथ जांच होगी—इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
