नियमों का मखौल उड़ातीं शिक्षा की दुकाने हो रहीं संचालित, कैसे होगा नौनिहालों का भविष्य सुघर

00 खेलने की तो दूर, बैठने की भी जगह नहीं
00 विषय विशेषज्ञों का अभाव
00 ले – देकर मिलती है मान्यता
कोरिया / शहर के कुछ नामीगिरामी स्कूलों को छोड़ दें, तो कई स्कूलों में वह सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है, जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आवश्यक है और अगर ऐसे में आरटीई नियम का कड़ाई से पालन हो जाए तो कई स्कूलो की मान्यता समाप्त कर स्कूलों में ताला भी लग सकता है। मान्यता के समय निजी स्कूलों के संचालक हर साल तमाम सुविधाएं पूरी करने की बात कहते हैं, लेकिन आने वाले हर साल स्कूलों में सुविधाएं पूरी नहीं हो पाती है और जिसका खामियाजा बच्चो को भुगतना पड़ता है।
जिले के सालका मुख्यमार्ग, पाण्डवपारा मुख्यमार्ग, चरचा से नगर मुख्यमार्ग, पटना से सूरजपुर मुख्यमार्ग और बछरापोंड़ी मुख्यमार्ग पर संचालित हो रही निजी स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। बावजूद असुविधाओं के बीच निजी स्कूलें संचालित हो रही हैं। स्कूलों पर आरटीई नियमों की खुलकर धज्जियां उड़ रही है। आरटीई नियम कागजों में सिमटकर रह गई है। आरटीई नियम लागू हुए सालों निकल गए, बावजूद नियमों के तहत निजी स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं है। नियमों को ताक में रखकर निजी स्कूल संचालक स्कूल चला रहे हैं। इन्हें हर साल आसानी से शिक्षा विभाग से मान्यता मिल जाती है, तो इसलिए ही स्कुल संचालक सुविधा बढ़ाने पर ध्यान नहीं देते।

aviary-image-1469800022173ताक पर नियम – जिले में संचालित सभी निजी स्कूलों में पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं को लेकर कुछ न कुछ कमी है। ज्यादातर स्कूलों के पास स्वयं का भवन नहीं है। किराए के बिल्डिंग पर संचालित हो रही है। कुछ स्कूल तो शटरनुमा दुकानों व सीट लगे झोपड़ियों पर लग रही हैं। जहां छात्र – छात्राओं के आधार पर पर्याप्त सुविधा नहीं है। स्कूलों में विद्युत, रेम्प, पेयजल, शौचालय, मूत्रालय, बाउन्ड्रीवाल, खेल का मैदान, अग्निशमक यंत्र की सुविधा तक नहीं। अतिआवश्यक शौचालय व मूत्रालय जैसी सुविधाओं का भी खासा अभाव है।

ले – देकर मिलती है मान्यता – स्कूल की मान्यता तो किसी तरह लेदेकर ले लेते हैं और बच्चों के माता-पिता को गुमराह कर बच्चों को अपने स्कूल में दाखिला दिलवा लेते हैं, लेकिन जब बच्चा स्कूल आना शुरू करता है तो बच्चे को बैठने के लिए न सिर पर छत होती है और न ही टेबिल-कुर्सी।

क्या है नियम – किसी भी स्कूल को शुरू करने के दौरान जो दस्तावेज मांग जाते है उसे पूरा कर पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है। ऐसे में बीच का रास्ता ले-देकर निकाल लिया जाता है, विभागीय सूत्रों के मुताबिक किसी भी नए या फिर पुराने स्कूल में पर्याप्त रोशनी, पानी, बैठक व्यवस्था के अलावा साइंस व कम्प्यूटर के लैब, खेल का मैदान इत्यादि होना चाहिए। जबकि देखा जाए तो ज्यादातर स्कूलें इस नियम का पालन नहीं कर रही है। शहरी क्षेत्र व ग्रामीण अंचलों में यह समस्या बराबर बनी हुई है, निजी स्कूल संचालकों द्वारा सभी संबंधित अधिकारियों को नजराना देकर मान्यता ले लेते हैं। इस तरह की स्कूल शहर के अलावा ग्रामीण अंचलों में भी तेजी से बढ़ रही है, जहां पर स्कूल संचालक के पास केवल एक या दो ही कमरा है और उसमें कक्षाएं संचालित की जा रही है। जहां स्कूल के पास न ही खेल का मैदान है और न ही लैब, पानी आदि की व्यवस्था भी नहीं होती है। फिर भी स्कूल को बड़े ही सुचारू रूप से चलाया जा रहा है। स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों की कम से कम योग्यता स्नातक की होनी चाहिए, जबकि पढ़ाने वाले शिक्षक 8वीं, 10वीं पास होते हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे बोर्ड के छात्रों को क्या शिक्षा देंगे।

विषय विशेषज्ञों का अभाव – संचालकों द्वारा कम पैसे में शिक्षकों रखते हैं जिससे कम पैसे में कम पढ़े-लिखे शिक्षक ही मिलते हैं। ऐसे में 12वीं तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए 12वीं पास शिक्षक मिलते हैं तो ऐसी सूरत में ऐसे शिक्षक बच्चों को क्या शिक्षा देंगे यह अहम सवाल बना हुआ है।

घरों में चल रहे कई स्कूल – स्कूल संचालकों की सबसे बड़ी मनमानी पहली से आठवीं यानी मिडिल स्कूल तक देखने में आती है। इस स्तर तक के स्कूल संचालन के लिए जो नियम बनाए गए हैं उनमें शिथिलता का फायदा उठाते हुए स्कूल संचालक खूब मुनाफा कमाते हैं। बिल्डिंग, पेयजल, बैठक की पर्याप्त व्यवस्था होना तो दूर गली-गली में घर-घर में स्कूल चलाए जा रहे हैं। यहां सुविधाओं के नाम पर केवल किताबी शिक्षा दी जाती है, वो भी आधी-अधूरी। वो इसलिए क्योंकि यहां शिक्षकों की गुणवत्ता की जांच कभी नहीं की जाती।

aviary-image-1469799993818खेलने की तो दूर, बैठने की भी जगह नहीं – शहर में बच्चों के लिए घूमने, खेलने की जगहें लगातार घटती जा रही हैं। ऐसे में बच्चों और पालकों दोनों को अपेक्षा रहती है कि स्कूल में खेलने के लिए अच्छा मैदान और सुविधाएं मिलें। मगर कोरिया में ऐसे कई स्कूल हैं जिनमें नियमों के तहत जांच नहीं होने के कारण खेल के मैदान के नाम पर कुछ नहीं है। मिडिल स्कूल में खेल का मैदान भी अनिवार्यताओं में शामिल है, इसके बावजूद न के बराबर स्कूल ऐसे हैं जहां स्कूलों में खेल के मैदान हैं। कुछ स्कूल वाले खुद की बिल्डिंग में पढ़ाते हैं और सार्वजनिक मैदानों में बच्चों को खेलने पहुंचा देते हैं। इस तरह के स्कूलों में खेल गतिविधियां रोज नहीं होती और न ही रोज खेल के पीरियड रखे जाते हैं।

कैसे हो जाती है मान्यता रिन्यू – स्कूलों चलाने वालों का एक और सबसे बड़ा कारनामा यह होता है कि ये वे स्कूल की मान्यता लेते समय तमाम तरह की औपचारिकताओं को कागजों पर पूरा कर देते हैं। मगर असल में उनके स्कूल में ऐसा कुछ होता ही नहीं। जैसे-तैसे स्कूल वाले इंस्पेक्शन में सब कुछ ‘ओके’ करवा लेते हैं और बाद में तमाम व्यवस्थाओं को मुनाफे को ध्यान में रखकर बदल दिया जाता है। यही नहीं, हर दो साल में मान्यता को रिन्यू करवाने में भी ये तमाम तरह की जुगाड़ कर लेते हैं। हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों के संचालन के कड़े नियम होने के बावजूद छोटे-छोटे प्लॉट पर मकान बनाकर स्कूल चलाए जा रहे हैं। फिर भी मगर जिला शिक्षा कार्यालय द्वारा कभी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

स्कूलों में खुलती दुकानें – निजी स्कूल चलाना अब एक व्यवसाय बन गया है। मनमानी फीस वसूलने के बाद अब ज्यादातर निजी स्कूलों में सामग्र्रियों की बिक्री को भी तरजीह दी जाने लगी है। स्कूलों में ही दुकानें खोल कर बच्चों को पुस्तक से लेकर यूनिफॉर्म तक की बिक्री की जाती है। कमाई के लिए स्कूलों द्वारा मनमाना पाठ्यक्रम लागू कर दिया जाता है, वहीं बच्चों को पुस्तकों के साथ ही कापियां तक स्कूल से ही खरीदने पर मजबूर किया जाता है और जिन स्कुलो में यह नहीं हो रहा है वहां नामचीन दुकानों से साठ-गांठ कर सिर्फ उनके दुकानों से ही कापी-पुस्तकों के साथ ही अन्य सामग्रियां लेनी की हिदायद दी जाती है।

कामायनी कश्यप – (जिला शिक्षा अधिकारी) – विकासखंड शिक्षा अधिकारियों द्वारा सतत निरिक्षण किया जाता है, निरीक्षण और उनकी रिपोर्ट के आधार पर संबंधित स्कूलों को मान्यता दी जाती है और उनका रजिस्ट्रेशन भी रिन्यूवल किया जाता है। कई शिकायतें भी आ रही है की कुछ स्कूल संचालकों द्वारा नियमानुसार संचालन नहीं किया जा रहा है। अभी मैं अस्वस्थ हूँ स्वस्थ होते ही मैं खुद निरिक्षण करुँगी साथ ही कार्यवाही भी करुँगी।

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