रायपुर / पूरे भारत मे इन दिनों प्रवासी मज़दूरों के अपने गाँव, कस्बे, ब्लॉक, शहर, राज्य को लौटने का नज़ारा समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सुर्खियां पर है लेकिन क्या वाकई केंद्र सरकार और राज्य सरकार गंभीर है? यह विषय अब राष्ट्रीय चिंता का हो गया है क्योंकि भारत के सभी राज्यो से मज़दूरों का जीवन यापन के लिए पलायन होता है किंतु वैश्विक परिदृश्य में कोरोना महामारी ने इन असहाय, भूखे-प्यासे प्रवासी मज़दूरों को अपने घर, गांव, ब्लॉक, शहर, राज्य पैदल ही लौटने को मजबूर कर दिया है।
इन गरीबो को अच्छे जीवन यापन और रंगीन सपने दिखाकर इन्हें ले जाने वाले संकट की घड़ी में गायब है! सरकार को सूझ नही रही की लाखों मज़दूरों की घर वापसी इस लॉकडौउन में कैसे और किस प्रकार होगी,क्या उपाय किये जायें? बेचारे भूखे प्यासे, सैकड़ो, हज़ारो किलोमीटर की यात्रा वह भी निरंतर चलते जाना जिसकी मंज़िल उन्हें भी नही मालूम कि वो जहां जाना चाहते हैं वहां पहुंच पाएंगे या नही या पहले ही दम तोड़ देंगे?
लॉकडौउन के समय शहरों में रंगीन गागल लगाकर,मोबाइल कैमरे में फ़ोटो खिंचाते हुए खाना बांटने का कुछ स्वयम्भू लोगो ने ठेका ले लिया है और उन्हें बांट रहे है जिनके पास सब कुछ है। अरे बाँटा जाना है तो हज़ारो किलोमीटर की पैदल यात्रा करने वाले लोगो की भीड़ को बांटो, पानी बांटो, चार पहिये वाहन में इन्हें उस मंज़िल तक पहुचाओ जहां ये सब जाना चाहते है। लेकिन सरकार ये सब नही करेगी।बसें, ट्रेन खड़ी है, उसे चालू करो निश्चित गन्तव्य तक लाखो गरीब, बेसहारा, असहाय, भूखे प्यासे मज़दूरों को उनके घर तक पहुंचा दो, भोजन दे दो, नही केवल ट्विटर, फेसबुक में सरकार की तरफ से यात्रा की जानकारी साझा की जाएगी।अरे वो गरीब मज़दूर, पैदल चलकर रात के अंधेरे में भुखे प्यासे सड़क पर ट्विटर, फेस बुक पर स्टेटस देखेंगे कि सरकार ने क्या गाइड लाइन तैयार करके जारी की है?
अब इन मज़दूरों की बेबसी, लाचारी देखकर लगता है कि इन लोगो ने जीवन यापन के लिए बड़े बड़े महानगरों में जो सीमेंट की मंज़िल बनाई है वहाँ से पैदल घर को वापस लौटना इनके जान की जोखिम ना बन जाये, बेहतर होगा कि लॉकडौउन के रहते केंद्र और राज्यों के आपसी तालमेल से मज़दूरों की सकुशल घर वापसी हो जाये।
