रायपुर।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में सबसे चर्चित मुद्दा – मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का मंत्रिमंडल विस्तार – फिलहाल टल गया है। 18 अगस्त को विस्तार की अटकलें तेज थीं, लेकिन पार्टी के भीतर असहमति और वरिष्ठ विधायकों की नाराज़गी की वजह से इस पर रोक लगा दी गई है।
विदेश दौरे से पहले चर्चा
मुख्यमंत्री साय के विदेश दौरे से पहले राजधानी में मंत्रिमंडल विस्तार की तैयारियां लगभग पूरी मानी जा रही थीं। तीन नए चेहरों को शामिल करने की चर्चा थी। इनमें एक सामान्य वर्ग, एक अनुसूचित जनजाति और एक पिछड़ा वर्ग से मंत्री बनाए जाने की संभावना थी। साथ ही बिलासपुर, सरगुजा और दुर्ग संभाग से प्रतिनिधित्व देने का फॉर्मूला तैयार था।
पहली बार के विधायकों के नाम पर विवाद
बीजेपी संगठन ने इस बार पहली बार के विधायकों को मंत्री बनाए जाने का संकेत दिया था। संगठन का मानना था कि नए चेहरों के जरिए पार्टी भविष्य की तैयारी करेगी।
लेकिन यही फैसला वरिष्ठ और कद्दावर विधायकों की नाराज़गी की वजह बन गया। लंबे समय से पार्टी के साथ रहे अनुभवी नेताओं को किनारे कर नए विधायकों को मौका दिए जाने की चर्चा से खींचतान बढ़ गई।
पुरानी टीम फिलहाल सुरक्षित
साय सरकार के मौजूदा मंत्रियों की कुर्सी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। विस्तार टलने से वर्तमान मंत्रिमंडल जस का तस रहेगा। संगठन फिलहाल स्थिति को संभालने और असंतोष को शांत करने में जुट गया है।
कौन-कौन हो सकते थे शामिल?
सूत्रों के मुताबिक –
बिलासपुर संभाग से अमर अग्रवाल और लखनलाल देवांगन का नाम चर्चा में था।
सरगुजा संभाग से एक आदिवासी चेहरा – शकुन्तला पोर्ते या हेमलाल साहू पर चर्चा थी।
दुर्ग संभाग से विजय बघेल खेमे के किसी नाम पर विचार हो रहा था।
हालांकि, वरिष्ठ नेताओं ने इन नामों पर आपत्ति जताई है।
अब क्या आगे?
मुख्यमंत्री के विदेश दौरे से लौटने के बाद पार्टी विस्तार पर दोबारा विचार करेगी।
संगठन और संघ की सहमति के बाद ही नए मंत्रियों की सूची तय होगी।
वरिष्ठ विधायकों की नाराज़गी दूर किए बिना फैसला संभव नहीं है।
विश्लेषकों का कहना है कि विस्तार टलने से भाजपा के अंदर खींचतान और गुटबाजी खुलकर सामने आई है। नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी – असंतोष को शांत कर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधना।
