एमसीबी – चिरिमिरी।
नगर निगम चिरिमिरी में सामने आया कथित वाहन बीमा घोटाला आज भी जांच के इंतजार में है। सूचना के अधिकार (RTI) से उजागर हुए इस मामले ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। मामला नगर निगम की सीमा से निकलकर राज्य और केंद्र सरकार तक पहुंचा, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक जांच की प्रक्रिया शुरू तक नहीं हो सकी।
RTI से हुआ बड़ा खुलासा
आरटीआई कार्यकर्ता राकेश सिंह द्वारा प्राप्त दस्तावेजों में खुलासा हुआ था कि नगर निगम की 50 से अधिक गाड़ियों का बीमा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दर्शाया गया। कई फाइलों में न तो वैध पॉलिसी नंबर दर्ज थे और न ही बीमा कंपनी का स्पष्ट उल्लेख।
दस्तावेजों की जांच में यह भी सामने आया कि कुछ बीमा पॉलिसियों पर लगे बारकोड को स्कैन करने पर दूसरी गाड़ियों की जानकारी सामने आती थी, जिससे बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े की आशंका और गहरी हो गई।
चार साल चलता रहा खेल
दस्तावेजों के अनुसार यह मामला एक-दो साल का नहीं बल्कि करीब चार वर्षों तक लगातार चलता रहा। इस दौरान नगर निगम द्वारा हर साल बीमा का टेंडर “मंजिता ई-सेल्युशन CSC सेंटर” नामक एक ही फर्म को दिया जाता रहा। आरोप है कि कई मामलों में बीमा केवल कागजों में ही दिखाया गया, जबकि वास्तविकता में नगर निगम की कई गाड़ियां बिना वैध बीमा के ही सड़कों पर चलती रहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि इस दौरान कोई बड़ा हादसा होता तो उसकी जिम्मेदारी किस पर तय होती।
चिरिमिरी में गली-नुक्कड़ तक चर्चा
मामला सामने आने के बाद चिरिमिरी में यह मुद्दा चाय-पान की दुकानों से लेकर राजनीतिक मंचों तक चर्चा का विषय बन गया। कुछ लोग इसे पूर्व कार्यकाल की लापरवाही बता रहे थे, तो कुछ वर्तमान प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे थे।
PMO तक पहुंची शिकायत
आरटीआई कार्यकर्ता ने इस पूरे मामले की शिकायत नगर निगम आयुक्त, महापौर, जिला प्रशासन, मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक भेजी है। शिकायत में मांग की गई है कि:
पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए
दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो
सरकारी खजाने को हुए नुकसान की वसूली की जाए
हालांकि शिकायत भेजे जाने के बाद भी अब तक जांच की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दी।
महापौर का बयान, पर कार्रवाई गायब
नगर निगम चिरिमिरी के महापौर रामनरेश राय ने मामले की गंभीरता स्वीकार करते हुए कहा था कि जांच कराई जा रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
लेकिन लंबे समय बीत जाने के बाद भी जांच की कोई स्पष्ट प्रगति सामने नहीं आई, जिससे प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बड़ा सवाल
इस पूरे मामले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कागजी बीमा के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट सिर्फ चिरिमिरी नगर निगम तक सीमित है, या फिर प्रदेश के अन्य नगर निगमों में भी इसी तरह का खेल चल रहा है।
यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो यह सिर्फ एक स्थानीय घोटाले का नहीं, बल्कि प्रदेश स्तर की प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश कर सकता है।
