नर्सरी से यूकेजी तक ‘नो बैग, नो टेक्स्टबुक’ का सुझाव, कक्षा 1-2 को होमवर्क से राहत की सिफारिश; निजी और सरकारी स्कूलों पर लागू हो सकते हैं नए दिशा-निर्देश
रायपुर, 30 अक्टूबर। स्कूल की घंटी बजते ही पीठ पर भारी बस्ता लादकर कक्षाओं की ओर बढ़ते नन्हे बच्चों की तस्वीर अब बदल सकती है। पढ़ाई के नाम पर बच्चों के नाजुक कंधों पर बढ़ते बोझ को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने गंभीर रुख अपनाया है। आयोग ने स्कूल शिक्षा विभाग को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और NCERT की स्कूल बैग पॉलिसी 2020 के अनुरूप बस्ते का वजन निर्धारित करने की कड़ी अनुशंसा भेजी है।
आयोग का मानना है कि भारी बस्तों से बच्चों की रीढ़, कंधों और शारीरिक मुद्रा पर प्रतिकूल एवं दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। अनुशंसा के अनुसार स्कूल बैग का वजन बच्चे के शरीर के वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
छोटे बच्चों के लिए नो बैग, नो टेक्स्टबुक
आयोग ने नर्सरी से यूकेजी तक ‘नो बैग, नो टेक्स्टबुक’ व्यवस्था की अनुशंसा की है। कक्षा 1-2 के लिए बस्ते का वजन 1.6 से 2.2 किलोग्राम और कक्षा 3-5 के लिए 1.7 से 2.5 किलोग्राम रखने का सुझाव दिया गया है। कक्षा 1-2 के बच्चों को होमवर्क नहीं देने की भी सिफारिश है।
कक्षा बढ़ेगी, लेकिन बस्ते का बोझ नियंत्रित रहेगा
कक्षा 6-7 के लिए 2 से 3 किलोग्राम, कक्षा 8 के लिए 2.5 से 4 किलोग्राम, कक्षा 9-10 के लिए 2.5 से 4.5 किलोग्राम और कक्षा 11-12 के लिए 3.5 से 5 किलोग्राम वजन की सीमा प्रस्तावित की गई है।
इसके अलावा NEP 2020 के प्रावधानों के अनुरूप साल में 10 बैगलेस डे आयोजित करने का सुझाव दिया गया है। भारी संदर्भ पुस्तकों के स्थान पर DIKSHA और e-Pathshala जैसे डिजिटल संसाधनों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है।
स्कूलों में होगी बस्तों की तौल?
आयोग ने प्रत्येक विद्यालय में डिजिटल तौल मशीन, बैग वेट रजिस्टर, पुस्तकों पर वजन का उल्लेख और पर्याप्त पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करने का सुझाव दिया है।
अब गेंद स्कूल शिक्षा विभाग के पाले में है। आयोग ने सभी सरकारी, अनुदान प्राप्त और निजी स्कूलों के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार करने का आग्रह किया है। हालांकि ये फिलहाल आयोग की अनुशंसाएं हैं, अंतिम सरकारी आदेश नहीं।
सवाल सिर्फ बस्ते के वजन का नहीं, बच्चों के बचपन और सेहत का भी है। किताबों का ज्ञान जरूरी है, लेकिन उस ज्ञान का बोझ बच्चों के कंधों पर उनकी शारीरिक क्षमता से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
