रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन नक्सलवाद के खात्मे को लेकर केंद्र सरकार के प्रति आभार प्रस्ताव पर दिनभर जोरदार चर्चा हुई। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अनुपस्थिति में वन मंत्री केदार कश्यप ने सदन में प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कांग्रेस ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए चर्चा का बहिष्कार किया, जिसके चलते विपक्ष की सीटें खाली रहीं। लंबी चर्चा के बाद सदन ने आभार प्रस्ताव पारित कर दिया।
प्रस्ताव से पहले मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि डबल इंजन सरकार ने वह काम कर दिखाया, जिसे लंबे समय तक असंभव माना जाता था। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों के साहस, नई रणनीति और बस्तर की जनता के सहयोग से छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्ति मिली। उन्होंने कहा कि विधानसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, सुरक्षा बलों और इस अभियान में योगदान देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि कांग्रेस इस चर्चा में भाग नहीं लेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्ताव में नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवानों और आम नागरिकों का उल्लेख नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय नक्सल विरोधी अभियानों पर हुए खर्च की राशि केंद्र सरकार वापस नहीं मांगती थी, जबकि अब छत्तीसगढ़ से पैसे मांगे जा रहे हैं। महंत ने आभार प्रस्ताव को “चापलूसी और चमचागिरी” करार दिया।
चर्चा की शुरुआत वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने की। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट विचारधारा सत्ता को बंदूक की नोक से हासिल करने की बात करती थी, लेकिन लोकतंत्र और सुरक्षा बलों ने उस विचारधारा को पराजित कर दिया।
उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि आज पूरा बस्तर, पूरा छत्तीसगढ़ और पूरा देश नक्सलवाद के खात्मे से गदगद है, लेकिन कांग्रेस सदन से गायब है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिस तरह आज सदन में कांग्रेस की कुर्सियां खाली हैं, उसी तरह आने वाले समय में देश की राजनीति से भी कांग्रेस खाली हो जाएगी।
वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि नक्सलवाद की लड़ाई उनके लिए व्यक्तिगत पीड़ा का विषय भी रही है, क्योंकि उन्होंने अपने भाई को इस हिंसा में खोया है। उन्होंने कहा कि जिन सड़कों पर कभी बारूद बिछा रहता था, वहां आज विकास की सड़कें बन रही हैं। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग हिड़मा जैसे नक्सली का महिमामंडन करते हैं, वे इस ऐतिहासिक चर्चा की भावना को नहीं समझ सकते।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि पूरा विपक्ष चर्चा से गायब रहा। उन्होंने कहा कि वह झीरम घाटी हमले में शामिल नक्सलियों के खात्मे की जानकारी सदन में रखना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस ने चर्चा से दूरी बना ली। उन्होंने सवाल उठाया कि 172 जवानों की हत्या करने वाला हिड़मा किसी का रोल मॉडल कैसे हो सकता है।
चर्चा के समापन पर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह का संबोधन भावुक कर देने वाला रहा। सदन में खड़े होकर उन्होंने कहा कि आज की चर्चा को कई पीढ़ियां याद रखेंगी। उन्होंने कहा कि अनेक विधायकों की आंखें नम थीं क्योंकि किसी ने अपना भाई, किसी ने अपने परिजन और किसी ने अपना गांव नक्सली हिंसा में खोया है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं इस संघर्ष के चश्मदीद गवाह हैं और 15 वर्षों तक नक्सलवाद की विभीषिका को बेहद करीब से देखा है।
डॉ. रमन सिंह ने बताया कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी संख्या में पुलिस जवानों की भर्ती हुई, डीआरजी का गठन किया गया और जंगल वारफेयर की रणनीति अपनाई गई। उन्होंने बस्तर के उन दिनों को याद किया जब नक्सलियों ने अबूझमाड़ में बिजली के खंभे और मोबाइल टावर गिरा दिए थे, जिससे कई दिनों तक पूरा इलाका अंधेरे में डूबा रहा। उन्होंने कहा कि कभी बस्तर में अधिकारियों की पोस्टिंग से लोग डरते थे, लेकिन आज वही बस्तर विकास की नई कहानी लिख रहा है। उन्होंने इसे दुनिया की सबसे बड़ी नक्सल विरोधी लड़ाई की जीत बताते हुए कहा कि इस संघर्ष को इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।
विपक्ष के बहिष्कार पर विधानसभा अध्यक्ष ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि समझ नहीं आता कि कांग्रेस नक्सलवाद के विरोध की चर्चा सुनना क्यों नहीं चाहती। उनका कहना था कि ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर सभी को एकजुट होकर चर्चा में भाग लेना चाहिए था।
दिनभर चली चर्चा और तीखी राजनीतिक नोकझोंक के बाद नक्सलवाद के खात्मे पर केंद्र सरकार के प्रति आभार प्रस्ताव सदन में पारित हो गया। सत्ता पक्ष ने इसे छत्तीसगढ़ के इतिहास का ऐतिहासिक क्षण बताया, जबकि कांग्रेस अपने बहिष्कार के फैसले पर कायम रही।
