100% दृष्टिबाधित बच्चे, लेकिन हौसले 100% बुलंद; कोई शिक्षक बनने का सपना देख रहा तो कोई कलेक्टर बनने की तैयारी में
रायपुर। आंखों से दुनिया दिखाई नहीं देती, लेकिन सुरों की दुनिया इन बच्चों के लिए किसी रोशनी से कम नहीं है। उंगलियां जब हारमोनियम के सुरों पर चलती हैं और तबले पर ताल पड़ती है तो सामने बैठे लोगों की तालियां इनके हुनर की गवाही देती हैं। ये बच्चे 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं, लेकिन इनके हौसले और प्रतिभा के सामने दृष्टिबाधिता कहीं टिकती नजर नहीं आती।
शिक्षक दिवस के मौके पर रायपुर के मठपुरैना स्थित शासकीय दृष्टि एवं श्रवण बाधितार्थ विद्यालय की कहानी उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है, जो परिस्थितियों को अपनी कमजोरी मान लेते हैं। इस विद्यालय में दृष्टिबाधित और श्रवण बाधित विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ संगीत, सिलाई, खेल और मोबिलिटी जैसी गतिविधियों के जरिए आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयार किया जाता है।
सुरों में तलाशते हैं अपनी दुनिया
विद्यालय के दृष्टिबाधित विद्यार्थियों की संगीत में खास रुचि है। हारमोनियम पर उंगलियों की पकड़ हो या तबले पर ताल की समझ, इन बच्चों का हुनर देखते ही बनता है। संगीत इनके लिए महज एक विषय नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने और भविष्य संवारने का जरिया बन रहा है।
यहां विद्यार्थियों को सामान्य बच्चों की तरह पाठ्यक्रम के विषय पढ़ाए जाते हैं। इसके साथ ही दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए मोबिलिटी और संगीत जैसे अतिरिक्त विषय भी शामिल हैं, ताकि वे रोजमर्रा की जिंदगी में आत्मनिर्भर बन सकें।
किताबों के साथ आत्मनिर्भरता का पाठ
विद्यालय के शिक्षक बताते हैं कि यहां बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जाता। उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने और समाज में सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए जरूरी हुनर भी सिखाए जाते हैं।
यही वजह है कि इस विद्यालय से शिक्षा हासिल करने वाले कई विद्यार्थी आगे चलकर शिक्षक, लेक्चरर, असिस्टेंट प्रोफेसर और केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
आज यहां पढ़ने वाले बच्चों में भी भविष्य को लेकर बड़े सपने हैं। कोई इसी विद्यालय में शिक्षक बनकर अगली पीढ़ी को पढ़ाना चाहता है तो कोई कलेक्टर बनने का सपना देख रहा है। आंखों की रोशनी भले ही नहीं है, लेकिन सपनों की उड़ान में कोई कमी नहीं।
नौ साल पहले पांच छात्राओं ने दी थी ‘स्वच्छता गीत’ को आवाज
इस विद्यालय से जुड़ी उपलब्धियों में एक कहानी बेहद खास है। रायपुर शहर में सुबह-सुबह स्वच्छता वाहिनी के जरिए सुनाई देने वाले स्वच्छता गीत को करीब नौ वर्ष पहले इसी विद्यालय की पांच छात्राओं ने अपनी आवाज दी थी।
आज ये छात्राएं देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रही हैं और संगीत को ही अपने जीवन-यापन का माध्यम बना रही हैं। यह उपलब्धि बताती है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो दृष्टिबाधिता प्रतिभा के रास्ते में बाधा नहीं बनती।
जिस स्कूल में पढ़े, वहीं शिक्षक बनकर लौटा हुनर
इस विद्यालय की सबसे प्रेरक बात यह है कि यहां के प्राचार्य ए.के. त्रिपाठी और संगीत शिक्षक अभिनंदन नशीने दोनों इसी विद्यालय के पूर्व छात्र हैं।
दोनों दृष्टिबाधित होने के बावजूद अपनी शिक्षा पूरी कर आज उसी संस्था में अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। जिस विद्यालय ने कभी उन्हें सपने देखने और आगे बढ़ने का अवसर दिया, आज वे उसी विद्यालय में बच्चों के सपनों को दिशा दे रहे हैं।
विद्यालय के प्राचार्य एवं अधीक्षक ए.के. त्रिपाठी के मुताबिक विद्यालय वर्ष 1972 से संचालित हो रहा है। यहां दृष्टिबाधित और श्रवण बाधित विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती है। दृष्टिबाधित विद्यार्थियों का पाठ्यक्रम सामान्य बच्चों की तरह ही है, जबकि मोबिलिटी और संगीत जैसे अतिरिक्त विषय उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने बताया कि विद्यालय के विद्यार्थी जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रतियोगिताओं में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं।
दिव्यांगता नहीं, हुनर है इनकी पहचान
यह विद्यालय सिर्फ दृष्टिबाधित और श्रवण बाधित बच्चों को शिक्षा देने वाली संस्था नहीं है। यह उन सपनों को पंख देने वाली जगह है, जिन्हें समाज कई बार दिव्यांगता के कारण छोटा समझ लेता है।
यहां के बच्चे बता रहे हैं कि दृष्टि का अभाव सपनों का अभाव नहीं होता। हुनर, मेहनत और सही मार्गदर्शन मिले तो बिना आंखों की रोशनी के भी सफलता की राह रोशन की जा सकती है।
शिक्षक दिवस पर इन बच्चों और इनके शिक्षकों की कहानी उन तमाम शिक्षकों को सलाम है, जो किताबों के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनने का हुनर भी सिखा रहे हैं।




