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दिवाली बोनस: खुशियों की सौगात या कर्मचारियों का कानूनी अधिकार? जानिए कब और कैसे शुरू हुई यह परंपरा

1917 में कपड़ा मिलों के श्रमिकों को मिले युद्ध बोनस से जुड़ा है इतिहास, अब वेतन संहिता के तहत पात्र कर्मचारियों के लिए न्यूनतम 8.33 प्रतिशत बोनस का प्रावधान

विशेष रिपोर्ट | श्रमिक अधिकार और अर्थव्यवस्था

दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है। घरों में खरीदारी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं और नौकरीपेशा लोगों को अपने वेतन के साथ मिलने वाले बोनस का इंतजार रहता है। कर्मचारियों के लिए दिवाली बोनस केवल अतिरिक्त रकम नहीं, बल्कि त्योहार की खुशियों, परिवार की जरूरतों और सालभर की मेहनत के सम्मान से जुड़ा होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिवाली पर मिलने वाले बोनस की परंपरा का इतिहास केवल त्योहारों से नहीं, बल्कि श्रमिकों के अधिकारों और लंबे औद्योगिक संघर्ष से भी जुड़ा है?

भारत में बोनस देने की परंपरा की ऐतिहासिक जड़ें प्रथम विश्वयुद्ध के दौर तक जाती हैं। आधिकारिक कानूनी इतिहास के अनुसार, वर्ष 1917 में कुछ कपड़ा मिलों ने युद्ध के दौरान बढ़ती महंगाई और परिस्थितियों को देखते हुए श्रमिकों को उनके वेतन का लगभग 10 प्रतिशत युद्ध बोनस दिया था। इसके बाद बोनस को लेकर श्रमिकों और उद्योग प्रबंधन के बीच कई विवाद सामने आए। समय के साथ यह मुद्दा श्रमिक अधिकारों और औद्योगिक संबंधों का अहम हिस्सा बन गया।

वर्ष 1961 में बोनस के सवाल पर विचार के लिए त्रिपक्षीय आयोग की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके बाद लंबे विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप 29 मई 1965 को बोनस भुगतान अध्यादेश लाया गया और आगे चलकर भुगतान बोनस अधिनियम, 1965 अस्तित्व में आया। इस कानून ने पात्र कर्मचारियों के लिए बोनस को एक वैधानिक अधिकार का स्वरूप दिया।

कानून ने बोनस को दिया अधिकार का आधार

भुगतान बोनस अधिनियम, 1965 के तहत पात्र कर्मचारियों को न्यूनतम 8.33 प्रतिशत और अधिकतम 20 प्रतिशत तक बोनस देने का प्रावधान था। पात्रता के लिए निर्धारित वेतन सीमा और संबंधित लेखा वर्ष में कम से कम 30 दिन काम करने जैसी शर्तें लागू थीं। इस कानून का उद्देश्य कर्मचारियों को संस्थान के लाभ और उत्पादन से जुड़ी आर्थिक उपलब्धियों में हिस्सा देना था।

हालांकि, हर दिवाली पर मिलने वाली राशि को कानूनी बोनस मान लेना सही नहीं है। कई निजी संस्थान त्योहार के अवसर पर अपनी परंपरा, समझौते या प्रबंधन के निर्णय के आधार पर उपहार अथवा विशेष भुगतान करते हैं। वहीं कानून के तहत मिलने वाला वार्षिक बोनस अलग व्यवस्था है। कुछ परिस्थितियों में त्योहार के दौरान दिया गया पारंपरिक या अंतरिम बोनस वैधानिक बोनस में समायोजित भी किया जा सकता है। इसलिए त्योहार पर मिलने वाला बोनस और कानून के तहत मिलने वाला वार्षिक बोनस हमेशा एक ही चीज नहीं होते।

नए श्रम कानून में क्या बदला?

देश में श्रम कानूनों को सरल और एकीकृत करने की दिशा में लागू की गई वेतन संहिता, 2019 में बोनस से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इसकी संबंधित धाराएं 21 नवंबर 2025 से प्रभावी हुईं। इस संहिता के तहत पात्र कर्मचारियों को लेखा वर्ष में कम से कम 30 दिन काम करने की शर्त पूरी करने पर न्यूनतम 8.33 प्रतिशत बोनस या 100 रुपये, जो भी अधिक हो, देने का प्रावधान है। वहीं उपलब्ध आवंटनीय अधिशेष के आधार पर बोनस की अधिकतम सीमा 20 प्रतिशत तक हो सकती है।

बोनस की पात्रता के लिए वेतन की सीमा उपयुक्त सरकार की अधिसूचना से तय की जानी है। इसलिए पुराने कानून के तहत प्रचलित 21 हजार रुपये की वेतन सीमा को बिना नई अधिसूचना की पुष्टि के वर्तमान नियम मानना सही नहीं होगा।

सरकारी कर्मचारियों के मामले में भी स्थिति अलग हो सकती है। उन्हें मिलने वाला बोनस संबंधित सरकारी आदेशों, सेवा नियमों और लागू व्यवस्थाओं पर निर्भर करता है। इसलिए निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र के सभी कर्मचारियों पर एक जैसे नियम लागू नहीं माने जा सकते।

बोनस से बाजार को भी मिलती है रफ्तार

दिवाली बोनस का महत्व केवल कर्मचारी और उसके परिवार तक सीमित नहीं है। त्योहार के दौरान कर्मचारियों के हाथ में अतिरिक्त पैसा आने से बाजार में खरीदारी बढ़ती है। कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू सामान, वाहन, मिठाई और अन्य उत्पादों की मांग में तेजी आती है। इससे व्यापारियों के साथ-साथ छोटे दुकानदारों, सेवा क्षेत्र और स्थानीय कारोबार को भी लाभ मिलता है।

खासकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए बोनस त्योहार के खर्चों को संभालने में मददगार साबित होता है। कई परिवार इसी रकम से बच्चों के लिए कपड़े खरीदते हैं, घर की जरूरतें पूरी करते हैं या बचत और पुराने खर्चों का हिसाब संतुलित करते हैं।

मेहनत का सम्मान भी, आर्थिक सुरक्षा भी

दरअसल, बोनस की व्यवस्था श्रमिकों की मेहनत को सम्मान देने और उन्हें संस्थान की आर्थिक उपलब्धियों में हिस्सेदार बनाने की सोच से विकसित हुई है। यह केवल त्योहार की मिठास बढ़ाने वाली रकम नहीं, बल्कि श्रमिक कल्याण और औद्योगिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

दिवाली पर मिलने वाला हर अतिरिक्त भुगतान कानूनी अधिकार नहीं होता, लेकिन पात्र कर्मचारियों के लिए कानून के तहत मिलने वाला वार्षिक बोनस निश्चित प्रावधानों से जुड़ा है। ऐसे में कर्मचारियों के लिए जरूरी है कि वे अपने संस्थान की नीति, लागू श्रम कानून और पात्रता की शर्तों को समझें। वहीं नियोक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे कानून के अनुरूप भुगतान करें।

कुल मिलाकर, दिवाली बोनस की कहानी एक त्योहार की परंपरा से कहीं आगे जाती है। इसके पीछे श्रमिकों के संघर्ष, कानूनी सुधार और आर्थिक भागीदारी का लंबा इतिहास छिपा है। यही वजह है कि कर्मचारियों के लिए बोनस केवल त्योहार का तोहफा नहीं, बल्कि उनकी मेहनत की पहचान और अधिकार का प्रतीक भी है।

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