य़े खुदा तुने कब्र से भी कम दी है जमीं…
पाँव फैलाऊ तो दीवार को सर लगता है …?
00 सरकार से सैकड़ो शिकायत का जबाब भी नहीं आया
कोरिया / जिला मुख्यालय से १५ किमी दूर पटना इलाके में मुस्लिम समाज के लोगों को दुनिया छोड़ने के बाद दफन करने के लिए कब्रिस्तान तक मयस्सर नही है। इनके द्वारा कब्रिस्तान जैसे जगह के लिए सरकार से सैकड़ो बार मांग किया गया पर आज तक किसी ने इनकी सुध नही ली। यु तो सरकार की अल्पसंख्यक लोगो के लिए अनेक योजनायें प्रभावी हैं पर विकास की गाथा सिर्फ किताबों के पन्नो में ही पढने में अच्छा लगता है जो की असल से सच्चाई कोसों दूर है।
एक तस्वीर उस नायाब जगह की जहाँ लोग जाते तो हैं पर कभी दोबारा नही आते।
शहर से दूर इस वीराने जगह में हलचल तब होती है जब कोई इस दुनिया से रुखसत होता है वरना बाकि का समय खामोश रहता है इसलिए इस कौम के लोग इस जगह को शहर-ऐ-खामोसा भी कहते हैं जब इस शहर में मुसलमानों ने अपनी बस्ती आबाद की थी तो ब-मुश्किल १०० की संख्या में लोग रहे होंगे पर आज आबादी में इजाफे होते-होते इंसानी हलचल इतनी बढ़ गयी के इन्सान को कब्र के लिए भी जगह कम पड़ गया, तब के शुरूआती दौर में ऐसी समस्या नही होती थी पर आज हालात कुछ और ही है। वक्त के साथ साथ इन्होने लाश दफ़न करने के लिए एक ऐसी जगह का इंतजाम किया जो एक तालाब का मेड या खेत के मेढ (भीठ) है, इस मेड का दायरा लगभग २०० मी. के करीब है जहाँ तक़रीबन २५०० लाशों को दफनाया जा चूका है। अब अगर किसी लाश को दफ़न करने के लिए गड्ढा खोदा जाता है तो पहले से दफ़न किये हुए नर कंकाल निकल जाते हैं, ऐसे हालात में इस कौम के लोगों को अब स्थानाभाव के वजह से काफी परेशानी हो रही है।
इस कब्रिस्तान में यह छोटा सा जीर्ण-सीर्ण सा जो मकान है दरअसल य़े एक मजार है जो सालों पहले कभी कव्वाली जैसे रंगीन माहौल में रंगी रहती थी य़े भी आज बे रंग हो गया है। आज य़े जगह अपने नाम के ही जैसे बिलकुल वीरान हो गया, प्रशासन से उपेक्षित इस कब्रिस्तान में लाशों को दफ़न करने के बाद कब्र को नुकसान पहुंचाने अक़सर जानवरों से भी खतरा बना रहता है, बाउंड्रीवाल न होने की वजह से हमेशा से दफ़न किये गये लाशों को जानवर उठा ले जाते हैं जिसके देखभाल के लिए आज कई वर्षों से एक पहरेदार को नियुक्त किया गया है जो अपनी तकलीफ बया करे भी तो किस से? आज कई वर्षों से यहाँ के मुसलमानों ने कब्रिस्तान के लिए शासन-प्रशासन से मांग की परन्तु किसी ने इस ओर ध्यान नही दिया। शासन के कितने नुमाइंद्दे आकर चले गये पर किसी के कान में जू तक नही रेंगी और जब लोग मांग कर के थक गये हैं वही जनप्रतिनिधियों का अपना – अलग राग है जबकि अल्पसंख्यक की श्रेणी में रखे जाने वाले इस कौम के दम पर ही य़े राजनीती करते हैं और सिर्फ वादों के दम पर गद्दी पर बैठते है।
बहरहाल प्रशासन को इस गंभीर मुद्दे पर विचार कर इन्हें कब्रिस्तान के लिए जमीन दे तो ही बेहतर होगा वरना इनकी परेशानी स्थानाभाव के कारण दिन पर दिन बढती ही जा रही है।
