कोरिया / बैकुण्ठपुर – मॉ रसोई में खाना बनाती तो मुझे देने से पहले दो रोटी देते हुए कहती जा पहले बाहर जाकर गाय को रोटी खिलाकर आना उसके बाद तुझे खाना मिलेगा। मैं सोचता कि आखिर एेसी कौन सी वजह है कि मॉ रोज पहली रोटी गाय को खिलाने के लिए कहती थी। अब मुझे वह वजह मिल गई और जब से मैने होश सम्भाला तब से गौ सेवा ही मेरा जीवन का मुख्य उद्देश्य बन चुका है।
शहर के महलपारा इलाके में रहने वाले अनुराग दुबे गौ सेवा का एक एेसा पर्याय बन चुके हैं, जिसकी मिशाल यहां के लोग देते नहीं थकते। कहने के तो अनुराग जहां रहते हैं वह उनका घर है लेकिन वहां उनके परिवार के सदस्यों के साथ लगभग 50 गाय, बछड़े भी रहते हैं। जिससे उनका घर पूरी तरह गौशाला में तब्दील हो चुका है।

किसी क्षेत्र के नागरिकों की संवेदनाएं कैसी हैं, इसका अनुमान उनके द्वारा बेजुबान मवेशियों के प्रति किए जाने वाले व्यवहार से लगाया जा सकता है। क्षेत्र में रहने वाले युवा अनुराग दुबे द्वारा बेजुबान जानवरों के प्रति किस प्रकार का व्यवहार किया जाता है। यह उनके निवास के पास बनी गौशाला में देखा जा सकता है। जहां उनके घर की मात्र एक गाय है वहीं दो दर्जन से अधिक एैसे भी गौवंश है जो उन्हे सड़को पर लावारिस घूमते मिले, कई गाय तो एेसी हैं जो पर्याप्त आहार न मिल पाने के कारण कमजोर हो गई थीं। उन्हें भी उपचार और भोजन प्रदान कर नया जीवन मिल चुका है।

वर्तमान में इनकी गौशाला में 29 गाय, 6 बैल, 6 बछिया व 6 बछड़े हैं। जिनके चारा पानी में प्रतिमाह हजारों रूपए खर्च होते हैं। जिसके लिए वे स्वयं तत्पर रहते हैं, शहर में एवं आसपास के इलाके में यदि किसी गौवंश की मृत्यु की जानकारी यदि उन्हे प्राप्त होती है तो वे खुद के खर्चे पर उसका अंतिम संस्कार करवाते हैं। अभी तक श्री दुबे लगभग 2 सौ मवेशियों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं।
गौ रक्षा वाहिनी से जुड़े 38 वर्षीय अनुराग दुबे ने बताया कि इन गायो को रोजाना भोजन में लगभग एक से डेढ़ हजार रूपए खर्च होता है। उन्होनें शहर में एक गौशाला के संचालन के लिए शासन से भूमि की मांग की गई थी। लेकिन उन्हें अभी तक जगह उपलब्ध नहीं कराई गई। जिसके चलते बीते 15 वर्षो से अपने घर में ही गौशाला संचालित कर रहे हैं। अपनी माताजी की स्मृति में उन्होंने प्रेमाबाग में भी एक गौशाला का निर्माण कराया है।

गौवंश को दुर्घटना से बचाने के लिए उनके द्वारा रेडियम पट्टा भी बनवाया गया है। जिसे वे सड़कों पर घूमने वाले गौवंश के गले में बाधते हैं। ताकि रात के अंधेरे में वाहन चालको को गाय दिख सके। वहीं शहर में 50 से भी अधिक जगहों पर उनके द्वारा गायो के पानी पीने के लिए नांद रखवाया गया है।
अनुराग दुबे की बेजुबान जानवरों के प्रति संवेदना को देखते हुए नागरिक एकता मंच द्वारा बीते 8 सितम्बर को सम्मानित किया गया, वहीं बीते वर्ष 2016 को जिला प्रशासन व 15 अगस्त को सार्वजनिक रूप से भी इन्हें सम्मानित किया गया। अनुराग चाहते है कि यदि शहर में एक व्यवस्थित गौशाला का निर्माण करा दिया जाए तो इन बेजुबान जानवरों को भी एक बसेरा मिल सकता है।
