कोंडागांव से विजय शर्मा की रिपोर्ट / विलुप्त हो रही खादी को बचाने के लिए आज के युवा पिढी को आगे आने की जरूरत है, पुष्पा राय को आंखों से कम दिखाई देता है मगर 50 साल से चरखा चलाकर कपडे बुनने का काम करती हैें इनका भी सपना है की आज के युवा इस काम में आगे आये। हम बापु के सपने का रूकने नही देना चाहिए।
क्या – क्या बनता था यंहा – पुर्व में यहाँ लुगीं, गमछा, साडी़, धोती बैंडेज, कुर्ता बनते थे मगर अब आधुनिक फैशन के चलते खादी की मांग कम हो गयी है अब यंहा मात्र बैन्डेज ही बनता है। यहाँ बनने वाली बेंडेज प्रदेश के कई अस्पतालों में जाती है। रायपुर से पुरे देश तक पुहचाया जाता है। कम संसाधनों पर पुरा काम – 60 मशीनों में 25 मशीने खराब पडी है 35 मशीनों में ही 40 महिलायें काम करती है। दिनभर में मे एक से दो बेन्डेज और 3 मिटर कपडा तैयार होता है इन महिलाओं को एक साडी पर 250 रू मिलते है।
1960 में बनी थी दण्डकारणय बुनकर समिती – अनिता दास प्रबंधक 72 वर्ष पहले पुरा जंगल या क्षेत्र इस लिये दण्डकारणय क्षेत्र था। ये हमारे पास विस्थापन के बाद रोजगार के लिये कोई साधन नही था तब तात्कालिक प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर हमने चर्चा की तो हमे यह कुटीर उदयोग मिला और उन्होने कहा की इस परम्परा को जिवंत रखना तब बहुत काम होता था अब लोग आधुनिकता के चलते खादी से दूर हो रहे है। मगर हम इस परम्परा को अब तक जिवंत रखे है।
साबित साना प्रेसिडेंट दण्डकारणय बुनकर सहकारी समिती – हमे खुशी है, 58 वर्षो से चल रही हथकधा की सुध लेने प्रशासन ने भरोसा दिलाया हैं इससे लोगो मे खुशी है रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। अगर और वस्त्र बनने शुरू हुये तो युवाओ को हम प्रशिक्षण देने को भी तैयार है।
निलकंठ टेकाम कलेक्टर – यह हथकरधा समिती के कार्यो को करीबी से देखा है। पहले यहां 300 से 400 लोग काम करते थे इसे पुनः हम अच्छे से शुरू कर रहे है। यहां स्कुल ड्रेस से लेकर तमाम तरह के वस्त्र बनाने की योजना हैं और युवाओ को प्रशिक्षण भी देगें इसकी कार्य योजना बना रहे है।
