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भारत में मज़दूर क्यों हैं मजबूर ? – प्रकाशपुंज पाण्डेय

रायपुर / समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने मौजूदा हालात में लॉकडाउन में फंसे भारतीयों मज़दूरों की स्थिति को लेकर चिंता जताते हुए सरकार से प्रश्न किया है कि जो राष्ट्र निर्माता है वो भला क्यों उपेक्षित है?

मज़दूर, जिसने भारत की प्रगति की नींव रखी है, आज वो परेशान है और वो भी सिर्फ इसलिए कि उसे अपने परिवार के बीच अपने घर जाना है। केंद्र सरकार हो या फिर राज्य सरकार, दोनों ही मज़दूरों की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। मज़दूर वर्ग लॉकडाउन होने के कारण काम, जीविकोपार्जन व धन के अभाव में अपने घर जाना चाहता है तो क्या यह गलत है? क्या अब इस देश में कोई व्यक्ति अपने परिवार जनों से मिलने अपने घर भी नहीं जा सकता है, वो भी प्रतिकूल परिस्थितियों में?

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि लॉकडाउन की घोषणा करने से पहले क्या सरकार को पता नहीं था कि भारत वर्ष में रोजी-रोटी और रोजगार की तलाश में लोग अपने घरों से दूर दूसरे राज्यों में जाते हैं और वहीं रह कर काम करते हैं? कोई शौक से अपना परिवार छोड़कर हजारों मील दूर जाकर काम नहीं करता है। वो अपने परिवार के लिए ही ये कुर्बानी देता है। सरकार को चाहिए था कि लॉकडाउन की घोषणा से पहले ही कम से कम एक सप्ताह का समय देकर सभी लोगों को, मजदूर हो या श्रमिक हो या फिर और कोई व्यक्ति जो कि एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने के लिए जाते हैं, उन्हें बसों, ट्रेनों और यातायात के अन्य साधनों से उनके गंतव्य तक पहुंचाती और उसके बाद लॉकडाउन का सुनियोजित तरीके से घोषणा करती, तो इससे किसी को परेशानी भी नहीं होती। आज देखिए मजदूरों की स्थिति बेचारे सड़कों पर चल रहे हैं, भूखे – प्यासे, न जेब में पैसे, न खाने को रोटी, ना ही सरकारी इंतजाम। यहां तक कि रेलवे पटरी हो से भी अपने घर को जाने को विवश हैं क्योंकि सड़क से जाओ तो पुलिस डंडे मारती है। समाचार चैनलों और अखबारों के द्वारा पूरे देश ने देखा है कि कैसे मजदूर ट्रेनों के नीचे कटकर मर गए, कैसे पैदल चलते चलते उन्होंने अपना देह त्याग दिया, कैसे छोटे-छोटे बच्चे अपनी मृत माताओं के बगल में बैठे बिलक रहे हैं जिन्हें यह भी नहीं पता कि उनकी मां की मौत हो गई है।

ऐसी खबरें जो आपके दिल को दहला दें, सब ने देखा है। समझ सबको आता है, कोई व्यक्ति मूर्ख नहीं है। लेकिन सरकार, जनता को मूर्ख समझ कर केवल घोषणाएं करती है। आज भी जब इतना होने के बाद ट्रेनें शुरू हुई हैं तो देखा जा सकता है कि रेलवे स्टेशनों पर खाने के पैकेट और पानी की बोतलों के लिए कैसे लूट हो रही है। आखिर क्यों हो रही है लूट क्योंकि सरकारी इंतजाम नाकाफ़ी हैं। केवल कागजों पर और समाचार चैनलों पर घोषणा करने से ही काम नहीं होता। इसे जमीन पर उतर कर कार्यान्वित करने से ही रिजल्ट आता है।

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