Tuesday, February 7, 2023
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केवल नागपंचमी पर खुलने वाला मंदिर, दर्शन करने से दूर होता है काल सर्पदोष, नागचंद्रेश्वर मंदिर का रहस्य

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उज्जैन / इस बार नागपंचमी का त्योहार 2 अगस्त को मनाया जाएगा। सनातन परंपरा में नागों की पूजा का बहुत अधिक महत्व है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन नागों की पूजा की जाती है। साथ ही दूध चढ़ाया जाता है। नागपंचमी के दिन मंदिरों में काफी भीड़ होती है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारें में बताने जा रहे हैं जिसके पट श्रद्धालुओं के लिए साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी पर ही खुलते हैं जो लगातार 24 घंटे तक खुले रहते हैं। इस मंदिर में दर्शन के लिए लाखों की संख्या में श्रृद्धालु आते हैं। यह मंदिर है बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर के शिखर पर स्थित भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर। यह मंदिर उज्जैन में स्थित है। 

इस मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती एवं उनके पुत्र गणेशजी और नाग इस सिंहासन पर आसीन हैं। माना जाता है कि विश्व में ऐसा मंदिर और कही नहीं है। इस मंदिर की अपनी ही एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि इस दिन नागचंद्रेश्वर मंदिर में दर्शन करने से काल सर्प दोष दूर हो जाता है।

नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए नागपंचमी के दिन सुबह से ही लोगों की लम्बी कतारे लग जाती है। मान्यताओं के अनुसार,  इस दिन नाग तक्षक स्वयं मंदिर में आते हैं और दर्शन करने वाले के काल सर्प दोष का निवारण करते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान भोलेनाथ को अर्पित फूल व बिल्वपत्र को लांघने से मनुष्य को दोष लगता है, लेकिन भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने से यह दोष मिट जाता है। पंचक्रोशी यात्री भी नारियल की भेंट चढ़ाकर भगवान से बल प्राप्त करते हैं और यात्रा पूरी होने पर मिट्टी के बने घोड़ें यहां चढ़ाते हैं।

ऐतिहासिक साक्ष्य यह बताते हैं कि श्री नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी थी. नागपंचमी पर्व के अवसर पर श्री महाकालेश्वर और श्री नागचंद्रेश्वर भगवान के दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की जाती है। श्री महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में बंटा है और इस मंदिर के विशाल प्रांगण पहली मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर, दूसरी मंजिल पर श्री ओंकारेश्वर और तीसरी मंजिल पर भगवान नागचन्द्रेश्वर स्थापित हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं। उज्जैन (मप्र) के महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव मंदिर दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। ये मंदिर साल में एक बार नाग पंचमी पर ही खुलता है। मान्यता है कि इस मंदिर में विराजित नाग चंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से कालसर्प दोष और दुर्भाग्य दूर हो जाता है। प्राचीन परंपरा अनुसार का एकमात्र ऐसा भगवान नागचन्द्रेश्वर का मंदिर है जो भारतीय संस्कृति के अनुसार वर्ष में केवल श्रावण शुक्ल की पंचमी के दिन आम दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है. 60 फुट ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के नागपंचमी के पर्व के श्रद्धालुओं के दर्शन के लिये पहुंचने हेतु पुराने समय में एक-एक फुट की सीढियां बनाई थीं जो रास्ता संकरा और छोटा था. इस रास्ते से एक समय में एक ही दर्शनार्थी आ जा सकता था. लेकिन वर्ष प्रतिवर्ष देश के विभिन्न प्रांतों से यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं को देखते हुए एक अन्य लोहे की सीढियां का निर्माण कराया गया था. वर्तमान में आने जाने के अलग-अलग रास्ते बनाये गये हैं. इन लोहे की सीढियों के मार्ग के निर्माण होने से एक दिन में लाखों श्रद्धालु कतारबद्ध होकर नागचन्द्रेश्वर मंदिर में दर्शन का पुण्य लाभ लेते है. महाकालेश्वर मंदिर के महंत प्रकाशपुरी ने बताया कि नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी और चमत्कारिक एवं आकर्षक प्रतिमा के साथ श्री लक्ष्मी माता और शंकर पार्वती नंदी पर विराजित हैं। यह मंदिर शिखर के प्रथम तल पर स्थित है और नागचन्द्रेश्वर भगवान के साथ इनका भी पूजन नागपंचमी के दिन किया जाता है. उज्जैन में गत 17 जुलाई 2019 से शुरू हुए श्रावण माह की नागपंचमी के दिन में भगवान महाकालेश्वर मंदिर सहित अन्य महादेव मंदिर में प्रतिवर्ष विभिन्न प्रांतों से लाखों की संख्या में दर्शनार्थी दर्शन के लिये आते हैं. महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा भगवान महाकालेश्वर और भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए आये दर्शनार्थियों को नागपंचमी पर्व पर दोनों अलग-अलग मंदिर आने जाने के पृथक व्यवस्था की जाती है।

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