Wednesday, February 8, 2023
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आखिर छठ महापर्व मनाने की शुरुआत कैसे हुई और क्या हैं इसका महत्व, पढ़ें यह खबर …

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सनातन परंपरा में आस्था के महापर्व छठ पूजा का बहुत ज्यादा महत्व है. भगवान सूर्य और छठी मैया की पूजा से जुड़ा यह पर्व बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड समेत अब देश के कोने-कोने में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है. परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के सौभाग्य के लिए की जाने वाली छठ पूजा में व्रती को तीन दिनों को कठिन नियमों को पालन करना पड़ता है. इस व्रत को करने वाले व्रती को कठिन तप करते हुए तकरीबन 36 घंटे तक बगैर कुछ खाए-पिए हुए रहना पड़ता है.

28 अक्टूबर से महापर्व छठ की शुरुआत हो चुकी है। छठ का व्रत अत्याधिक कठिन माना जाता है। इसमें स्वच्छता और पवित्रता का खास ख्याल रखा जाता है। छठ पूजा प्रकृति को समर्पित पर्व कहा जाता है। पूजा सामग्री में भी फल, सब्जियां और प्राकृतिक चीजों रखा जाता है। मान्यता है कि छठ का व्रत करने से भगवान सूर्य समेत छठी मईया का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इतना ही नहीं छठ में मन की हर इच्छा भी पूर्ण होती है।

आइए जानते हैं कि जीवन से जुड़ी सभी कष्टों को दूर और कामनाओं को पूरा करने वाला यह व्रत कब और किसने शुरु किया.

छठ पूजा की रामायण काल से जुड़ी कथा

हिंदू मान्यता के अनुसार जब भगवान श्री राम लंंका विजय करके अयोध्या वापस लौटे तो उनके स्वागत में पहले आयोध्या के लोगों ने उनके स्वागत में दीप जलाकर खुशी मनाई थी, जिसे दीपावली पर्व के रूप माना गया. मान्यता है कि भगवान राम सूर्यवंशी थे, इसलिए उन्होंने रामराजय की स्थापना के बाद माता सीता के साथ सूयषष्ठी का व्रत किया और सप्तमी तिथि पर सूर्यदेव को अर्घ्य देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया. तब से लेकर आज तक सूर्य साधना का छठ महापर्व चला आ रहा है.

छठ पूजा की महाभारत काल से जुड़ी कथा

मान्यता है कि पांडव जब अपना सारा राजपाट जुएं में हारकर जंगलों में अज्ञातवास झेल रहे थे, तब द्रौपदी ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य की कठिन साधना से जुड़ा छठ व्रत किया था. मान्यता है कि छठ व्रत की पूजा के शुभ प्रभाव से पांडवों को अपना खोया हुआ राजपाठ मिल गया था. मान्यता यह भी है कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी, जो कि प्रतिदिन घंटों पानी में खड़े होकर प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यदेव की साधना किया करते थे. मान्यता है कि भगवान सूर्य की साधना से मिले आशीर्वाद से वे एक महान योद्धा बने.

छठ पूजा की राजा प्रियव्रत से जुड़ी कथा

मान्यता है कि प्रियव्रत नाम के राजा ने संतान की कामना को पूरा करने के लिए महर्षि कश्यप से उपाय पूछा तो उन्होंने उन्हें पुत्रयेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी. इस यज्ञ को करने के बाद राजा के यहां एक मरे हुए बच्चे ने जन्म लिया तो रााजासमेत पूरा नगर शोक में डूब गया. मान्यता है कि जब राजा अपने बच्चे का अंतिम संस्कार कर रहे थे, तभी षष्ठी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने कहा कि मैं सभी संतान की रक्षा करने वाली षष्ठी देवी हूं. ऐसा कहते हुए उन्होंने शिशु के मृत शरीर को स्पर्श करते हुए उसे जीवित कर दिया. मान्यता है कि इसके बाद राजा प्रियव्रत ने हर साल छठी मैया के व्रत को मनाने का ऐलान कर दिया.

छठ पूजा से जुड़ी अन्य कथा

मान्यता है एक बार एक नि:संतान महिला ने स्वस्थ और सुंदर संतान की कामना रखते हुए कार्तिक शुक्ल सप्तमी के दिन संकल्प किया कि यदि उसके पुत्र होगा तो वह विधि-विधान से व्रत करेगी. मान्यता है कि इसके कुछ समय बाद ही उसे सूर्यदेव की कृपा से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन वह व्रत करना भूल गई और समय बीतने के बाद उसके पुत्र का विवाह भी हो गया. मान्यता है कि विवाह के बाद लौटते समय वर-वधू ने रात बिताने के लिए जंगल में डेरा डाल दिया. इसके बाद जब सुबह हुई तो वधू ने अपने पति को मृत पाया. ऐसा देखते ही जब वह जोर-जोर से विलाप करने लगी तो उसके पास एक बूढ़ी महिला आई और उसने कहा कि, ‘मैं छठ माता हूं और तुम्हारी सास ने मेरी पूजा और व्रत नहीं कियाा. जिसके कारण मैंने तुम्हारे पति के प्राण हर लिए, लेकिन तुम्हारा विलाप देखकर मैं इसे दोबारा जीवित कर देती हूं. अब तुम घर जाकर अपनी सास को उसका संकल्प याद दिलाना. मान्यता है कि सास इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी मिलते ही अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने बाद में विधि-विधान से सूर्य षष्ठी का व्रत किया.

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