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मेकाहारा में बंद पड़ी मशीनों पर विधानसभा में हंगामा, मंत्री बोले– पिछली सरकार ने नहीं उठाया एक भी ठोस कदम


42 करोड़ की लागत से खरीदी जा रहीं नई मशीनें, 70 करोड़ की मेडिकल उपकरण खरीदी प्रक्रिया जारी

रायपुर, 16 जुलाई।
छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के तीसरे दिन राजधानी रायपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल (मेकाहारा) की खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाएं और वर्षों से बंद पड़ी जांच मशीनों का मामला सदन में गरमा गया। कांग्रेस विधायक शेषराज हरवंश ने प्रश्नकाल के दौरान सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में इतनी बड़ी संख्या में मशीनें बंद क्यों हैं और अब तक उनकी मरम्मत या खरीदी क्यों नहीं की गई।

जवाब में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि फिलहाल मेकाहारा में कुल 161 जांच मशीनें स्थापित हैं, जिनमें से 50 मशीनें बंद हैं। इनमें से 39 मशीनें अपनी समयावधि पूरी कर चुकी हैं, जबकि 11 मशीनों की मरम्मत की जा रही है। उन्होंने बताया कि सरकार 42 करोड़ रुपये की लागत से 39 नई जांच मशीनों की खरीदी कर रही है। इसके साथ ही 70 करोड़ रुपये की लागत से अन्य मेडिकल उपकरणों की खरीदी प्रक्रिया भी जारी है।

मंत्री जायसवाल ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, तब मेकाहारा के उन्नयन के लिए स्वास्थ्य विभाग को एक भी रुपया नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार ने पदभार संभालते ही अस्पताल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए ठोस और योजनाबद्ध प्रयास शुरू किए हैं। मंत्री ने दावा किया कि मेकाहारा की स्थिति अब पहले से कहीं बेहतर है और आने वाले दिनों में यहां मरीजों को और बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।

कांग्रेस विधायक शेषराज हरवंश ने कहा कि “मेकाहारा प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल है लेकिन यहां मरीजों को आवश्यक जांच सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं। मशीनें बंद हैं, मरीज निजी लैब में जांच कराने को मजबूर हैं। सरकार सिर्फ कागजों में खरीदी कर रही है।”

वहीं स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने जवाब में कहा, “हमने आते ही मशीनों की समीक्षा कराई। जिनकी मरम्मत संभव थी, वह करवा रहे हैं, और बाकी की खरीदी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पिछली सरकार ने इस ओर कोई काम नहीं किया था।”

विधानसभा में हुए इस तीखे सवाल-जवाब ने एक बार फिर राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर बहस छेड़ दी है। आम जनता की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि सरकारी घोषणाएं ज़मीन पर कब तक उतरती हैं।

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