कचना की जमीन, सड्डू में करोड़ों का प्लॉट!
RDA की नगर विकास योजना पर डॉ. गुप्ता के सवाल—“जनहित की योजना या जमीन का गणित?”
रायपुर। रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की लाभांडी-कचना-सड्डू नगर विकास योजना में भूखंडों के पुनर्गठन और आवंटन को लेकर सवालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। योजना की जानकारी RDA की वेबसाइट पर सामने आने के बाद ईएनटी विशेषज्ञ एवं समाजसेवी डॉ. राकेश गुप्ता ने एक मंत्री की पत्नी से जुड़ी कंपनी को प्रस्तावित भूखंड के आवंटन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। RDA की वेबसाइट पर इस योजना से संबंधित सीमांकन और फाइनल प्लॉट आवंटन की जानकारी सितंबर में प्रकाशित की गई है।
डॉ. गुप्ता का दावा है कि राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड की कचना के नालापारा क्षेत्र में करीब 1.33 एकड़ जमीन है। इसके बदले सड्डू में प्लॉट नंबर 25, करीब 2,168 वर्गमीटर यानी 23,327 वर्गफीट का भूखंड प्रस्तावित किया गया है। उनका दावा है कि यह भूखंड प्रस्तावित 150 फीट चौड़ी MR-43 सड़क के आसपास है और भविष्य में इसकी कीमत करीब 20 करोड़ रुपये तक हो सकती है। यही वह बिंदु है, जहां सवाल उठता है—जमीन कचना में और करोड़ों की संभावित कीमत वाला प्लॉट सड्डू में, आखिर यह जमीन का गणित किस किताब में लिखा है?

संकरी गली से सीधे ‘प्राइम लोकेशन’ तक?
डॉ. गुप्ता का आरोप है कि कंपनी की कचना स्थित जमीन तक पहुंच का रास्ता संकरा है और उसकी बाजार उपयोगिता सीमित थी। उनका सवाल है कि यदि मूल जमीन का पुनर्गठन किया जाना था तो अंतिम भूखंड उसी क्षेत्र या उसके आसपास क्यों नहीं दिया गया? उनके अनुसार, प्रस्तावित भूखंड मूल भूमि से करीब एक किलोमीटर दूर सड्डू में दिया जा रहा है।
यहीं से विवाद का सबसे बड़ा सवाल निकलता है—क्या नगर विकास योजना में जमीन का पुनर्गठन केवल नक्शे पर होता है या जमीन की कीमत और लोकेशन का भी कोई हिसाब होता है?
डॉ. गुप्ता ने छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 50 का हवाला देते हुए अंतिम भूखंड के पुनर्गठन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। अधिनियम में नगर विकास योजना तैयार करने तथा उस पर आपत्तियां-सुझाव आमंत्रित करने की वैधानिक प्रक्रिया का प्रावधान है।
95 हेक्टेयर की योजना, सड़क पर पूरा जोर?
डॉ. गुप्ता ने केवल एक भूखंड को लेकर ही सवाल नहीं उठाया है, बल्कि पूरी नगर विकास योजना की उपयोगिता पर प्रश्न खड़े किए हैं। उनका दावा है कि करीब 95 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित योजना का बड़ा फोकस MR-43 सड़क के निर्माण पर दिखाई देता है।
उनका सवाल है कि यदि मुख्य जरूरत सड़क निर्माण की है तो इतनी बड़ी जमीन को नगर विकास योजना में लेकर भू-स्वामियों की जमीन का पुनर्गठन करने की जरूरत क्यों पड़ी? वे यह भी दावा कर रहे हैं कि योजना में RDA के पास बड़ी मात्रा में बिक्री योग्य जमीन बचेगी।
तंज यही है—नाम नगर विकास योजना का, लेकिन हिसाब-किताब में सड़क, जमीन और प्लॉट की कीमतों का खेल ज्यादा नजर आ रहा है।
RDA के पास जमीन, भविष्य में करोड़ों की कमाई?
डॉ. गुप्ता का दावा है कि योजना में RDA के पास करीब 17.50 हेक्टेयर जमीन रहेगी, जिसमें लगभग 190 मिश्रित उपयोग वाले बिक्री योग्य भूखंड शामिल हैं। उन्होंने इनकी संभावित कीमत करीब 1,000 करोड़ रुपये और विकास कार्यों की लागत करीब 208 करोड़ रुपये बताते हुए लगभग 800 करोड़ रुपये के संभावित अंतर पर सवाल उठाया है।
हालांकि ये आंकड़े डॉ. गुप्ता द्वारा किए गए अनुमान और आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। यही वजह है कि इस पूरे मामले में सरकारी दस्तावेज, वास्तविक बाजार दर, विकास लागत और अंतिम आवंटन की स्थिति सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
‘विकसित भूखंड’ या विकास का खर्च भी भू-स्वामी का?
डॉ. गुप्ता ने बड़े आकार के अंतिम भूखंडों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि कई भूखंड एक एकड़ से बड़े हैं और कुछ 11.50 एकड़ तक के हैं। सवाल यह है कि यदि इन भूखंडों में आंतरिक सड़क, नाली, पानी और बिजली जैसी सुविधाओं का विकास बाद में भू-स्वामी को खुद करना होगा, तो इन्हें किस आधार पर विकसित भूखंड माना जा रहा है?
यानी सवाल सिर्फ “किसे कौन सा प्लॉट मिला?” का नहीं है। सवाल यह भी है कि “किस जमीन के बदले क्या मिला, उसकी कीमत क्या है और विकास का खर्च कौन उठाएगा?”
RDA का पक्ष भी सामने
मामले में RDA की ओर से दावा-आपत्तियों की प्रक्रिया का हवाला दिया गया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार RDA का कहना है कि यदि आपत्तियां आती हैं तो समिति उनकी जांच करेगी और उसके बाद निर्णय होगा। एक रिपोर्ट में RDA CEO अवनीश शरण के हवाले से भी यही बात सामने आई है।
ऐसे में फिलहाल आरोप और सरकारी प्रक्रिया—दोनों आमने-सामने हैं। डॉ. गुप्ता ने मुख्य सचिव को पत्र भेजकर पूरी योजना की जांच और योजना को निरस्त करने की मांग की है।
अब असली सवाल यही है कि दावे-आपत्तियों की फाइल में सिर्फ कागज खिसकेंगे या जमीन के इस पूरे गणित का हिसाब भी सार्वजनिक होगा? क्योंकि जब मामला करोड़ों की संभावित जमीन का हो, तो जनता का सवाल स्वाभाविक है—नगर विकास किसका, जमीन किसकी और फायदा आखिर किसका?
