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छत्तीसगढ़: 10 नगर निगमों में प्रशासकों की नियुक्ति, चुनाव में देरी पर गरमाई सियासत

रायपुर।छत्तीसगढ़ के 14 नगर निगमों में से 10 नगर निगमों के मेयर और सभापति का कार्यकाल खत्म हो गया है। इसके बाद नगरीय प्रशासन विभाग ने इन 10 नगर निगमों में प्रशासकों की नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी है। अब इन नगर निगमों का प्रशासन संभालने का जिम्मा संबंधित जिलों के कलेक्टर्स के हाथों में होगा। कलेक्टर्स ही शहर सरकार के रूप में निर्णय लेंगे और कामकाज का संचालन करेंगे।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राज्य में राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कांग्रेस और विपक्षी दलों ने सरकार पर चुनाव टालने का आरोप लगाया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, “राज्य सरकार चुनाव से डर रही है। इसलिए जानबूझकर चुनाव में देरी की जा रही है। अगर सरकार को भरोसा होता, तो चुनाव समय पर होते।”

वहीं, नेता प्रतिपक्ष ने भी इस मामले को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग को पत्र लिखा है। उनका कहना है कि “राज्यपाल को पहले ही पत्र भेजा गया था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलने के कारण अब राज्य निर्वाचन आयोग को पत्र लिखना पड़ा है। राज्य सरकार को जल्द से जल्द चुनाव कराना चाहिए ताकि जनता को चुनी हुई सरकार मिल सके।”

मुख्यमंत्री ने दी सफाई
इन आरोपों पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सफाई देते हुए कहा, “चुनाव टाला नहीं जाएगा, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से इसमें थोड़ी देरी हो रही है। प्रशासकों की नियुक्ति करना इसलिए जरूरी था ताकि नगर निगमों का काम प्रभावित न हो। चुनाव की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी।”

प्रशासकों की भूमिका
प्रशासकों के रूप में नियुक्त किए गए कलेक्टर अब इन नगर निगमों का संचालन करेंगे। इस दौरान वे प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय लेने के लिए अधिकृत होंगे। हालांकि, इससे जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।

जनता और राजनीतिक दलों की चिंताएँ
चुनाव में हो रही देरी को लेकर जनता और राजनीतिक दलों के बीच गहरी चिंता है। कांग्रेस इसे लोकतंत्र की अनदेखी बता रही है, जबकि बीजेपी का कहना है कि यह प्रशासनिक जरूरत थी। विपक्ष के मुताबिक, सरकार को चुनाव कराने में देरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे जनता के अधिकारों का हनन होता है।

क्या कहती है कानून व्यवस्था?
नगर निगम अधिनियम के तहत, मेयर और सभापति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव कराने की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जानी चाहिए। लेकिन अब तक चुनावी कार्यक्रम घोषित नहीं होने के कारण यह मामला विवाद का केंद्र बन गया है।

आगे क्या होगा?
अब सवाल उठता है कि चुनाव कब होंगे और सरकार इसे कैसे संभालेगी। राजनीतिक दलों के दबाव और जनता की नाराजगी को देखते हुए राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग पर तेजी से चुनाव कराने का दबाव बढ़ रहा है। वहीं, प्रशासकों की नियुक्ति के कारण प्रशासनिक काम तो चलता रहेगा, लेकिन इस फैसले का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार चुनावी प्रक्रिया में तेजी लाकर इस विवाद को कैसे शांत करती है।

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