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मनेंद्रगढ़ नगर पालिका चुनाव: प्रभा पटेल की हार, कांग्रेस की अंदरूनी कलह की जीत!

मनेंद्रगढ़। नगरपालिका अध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस की प्रभा पटेल को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा, जबकि प्रतिमा यादव ने बाज़ी मार ली। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि प्रतिमा यादव कैसे जीतीं, बल्कि यह है कि प्रभा पटेल आखिर क्यों हारीं? इस हार के पीछे तीन बड़े कारण बताए जा रहे हैं, जो कहीं न कहीं कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को उजागर करते हैं।

1. घर से ही उठी विरोध की आवाज़

नगरपालिका अध्यक्ष पद अन्य पिछड़ा वर्ग (महिला) के लिए आरक्षित होने के कारण प्रभा पटेल ने कांग्रेस से टिकट की दावेदारी की। पार्टी के भीतर उनके विरोधी मान चुके थे कि उनका जीतना तय है, लेकिन विरोध की पहली चिंगारी उनके घर से ही उठी। उनकी दो बहुओं ने भी टिकट के लिए दावा ठोक दिया, जिससे यह संदेश गया कि पटेल परिवार नगर पालिका पर एकाधिकार चाहता है। इससे कार्यकर्ताओं में असंतोष गहरा गया।

2. अहंकार ने ले ली बाज़ी

चुनाव जीतने का आत्मविश्वास होना अच्छी बात है, लेकिन जब यह आत्मविश्वास अहंकार में बदल जाए तो हार पक्की हो जाती है। प्रभा पटेल को प्रतिमा यादव बेहद कमजोर प्रत्याशी लग रही थीं, इसलिए उन्होंने पार्षदों के टिकट वितरण में अपनी मनमानी चलाई। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जबरदस्त असंतोष फैल गया। उनके कई करीबी सहयोगी भी उनसे नाराज हो गए और अंदर ही अंदर माहौल उनके खिलाफ बन गया।

कार्यकर्ताओं ने ही हरवा दिया चुनाव!

राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि कांग्रेस के अपने ही कार्यकर्ताओं ने पर्दे के पीछे रहकर इस हार की पटकथा लिखी। टिकट वितरण से उपजे असंतोष और कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने मतदान के दिन अपना असर दिखा दिया।

कांग्रेस को बड़ा झटका या सिर्फ एक स्थानीय घटना?

अब सवाल यह है कि क्या यह हार कांग्रेस के लिए एक बड़ी चेतावनी है या फिर महज एक स्थानीय घटना? मनेंद्रगढ़ के इस चुनाव ने यह साबित कर दिया कि यदि कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नज़रअंदाज किया जाए, तो जीत की गारंटी भी हार में बदल सकती है।

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