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157 साल पुराना बिश्रामपुर चर्च: यहीं से छत्तीसगढ़ में फैला ईसाई धर्म, छत्तीसगढ़ी भाषा को भी मिली नई पहचान


बिश्रामपुर/जशपुर।
छत्तीसगढ़ की धरती पर ईसाई धर्म की जड़ें जितनी गहरी हैं, उतना ही समृद्ध उसका इतिहास भी है। प्रदेश में ईसाई धर्म के प्रसार की शुरुआत आज से करीब 157 वर्ष पहले हुई थी और इसका केंद्र बना था बिश्रामपुर का ऐतिहासिक चर्च। क्रिसमस-2025 के अवसर पर यह चर्च न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि छत्तीसगढ़ के सामाजिक, शैक्षणिक और भाषाई इतिहास का भी एक अहम अध्याय है।


1868 में रखी गई थी नींव
इतिहासकारों के अनुसार, 19 मई 1868 को जर्मनी से आए मिशनरी रेवरेंड ऑस्कर लॉरर ने बिश्रामपुर में छत्तीसगढ़ के पहले चर्च की आधारशिला रखी। यही वह स्थान है, जहां से पूरे छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म के संगठित प्रचार-प्रसार की शुरुआत मानी जाती है।


धर्म के साथ शिक्षा और सेवा का संदेश
रेवरेंड लॉरर का उद्देश्य केवल धर्म प्रचार तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्थानीय लोगों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार पर विशेष ध्यान दिया। चर्च के साथ-साथ स्कूल, दवाखाने और सामाजिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की गई, जिससे ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार आया।


छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला लिखित स्वरूप
इस चर्च का सबसे महत्वपूर्ण योगदान छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास में माना जाता है। उस दौर में छत्तीसगढ़ी मुख्यतः एक बोली थी। रेवरेंड लॉरर ने स्थानीय भाषा सीखी और बाइबिल के ‘न्यू टेस्टामेंट’ का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया। इसे छत्तीसगढ़ी भाषा के शुरुआती लिखित साहित्य में से एक माना जाता है।


आज भी जीवंत है विरासत
बिश्रामपुर चर्च आज भी अपनी पुरानी स्थापत्य शैली, ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक गरिमा के साथ मौजूद है। हर साल क्रिसमस के अवसर पर यहां विशेष प्रार्थना सभाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दराज़ से लोग शामिल होते हैं।


आस्था, इतिहास और संस्कृति का संगम
यह चर्च सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता और सह-अस्तित्व का प्रतीक है। यहां आस्था के साथ-साथ इतिहास, भाषा और समाज के विकास की कहानी भी जुड़ी हुई है।


क्रिसमस पर विशेष महत्व
क्रिसमस-2025 के मौके पर बिश्रामपुर चर्च एक बार फिर श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों का केंद्र बना हुआ है। 157 वर्षों की यात्रा तय कर चुका यह चर्च आज भी छत्तीसगढ़ के धार्मिक इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।

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